कंप्यूटर झूठ बोलते हैं! परीक्षा के मैदान में आईटी टेक्नीशियन की जंग
परीक्षा का मौसम हो और ऊपर से तकनीक की मार हो, तो सोचिए आईटी विभाग के बंदों की हालत क्या होगी! स्कूल या कॉलेज में जब भी दोबारा परीक्षा (रिसिट) का समय आता है, सबकी धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। विद्यार्थी तो फिर भी पढ़ाई से डरते हैं, लेकिन आईटी वाले भाईसाब—उनकी नींद तो कंप्यूटर की जिद से उड़ जाती है। आज मैं आपको ऐसी ही एक रोचक घटना सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें कंप्यूटर ने ऐसा झूठ बोला कि सबके होश उड़ गए!
जब परीक्षा की तैयारी में आई मुश्किल
दोबारा परीक्षा का मौसम था। यानी वो विद्यार्थी जो छह महीने पहले फेल हो गए थे, उन्हें फिर से किस्मत आज़माने का मौका मिल रहा था। अब ये तो भारत हो या विदेश, परीक्षा के वक्त नई-नई परेशानी आ ही जाती है। यहां भी मामला कुछ खास था—एक विद्यार्थी को विशेष ज़रूरतों के चलते अकेले कमरे में परीक्षा देनी थी। लिहाज़ा, आईटी टीम को लैपटॉप देना पड़ा। सब कुछ सेट—सॉफ्टवेयर, नेटवर्क, फाइल-सेविंग, सब बढ़िया।
लेकिन जनाब, परीक्षा खाते (Exam Account) में सुरक्षा के नाम पर इतनी पाबंदियाँ थीं कि जैसे जेलर ने कैदी को ताले में जकड़ दिया हो—ना इंटरनेट, ना कोई फालतू प्रोग्राम, बस सीधे-सीधे परीक्षा का काम। वैसे, ये सब नकल रोकने के लिए बढ़िया था।
कंप्यूटर का मासूम सा झूठ!
अब परीक्षा के बाद फाइल प्रिंट करनी थी। आमतौर पर कंप्यूटर रूम की प्रिंटर से छपाई होती है, लेकिन लैपटॉप में यह सुविधा नहीं थी। सोच लिया, फाइल सर्वर से निकालकर प्रिंट कर लेंगे। लेकिन, अरे! फाइल तो सर्वर पर दिख ही नहीं रही थी!
लैपटॉप पर देखा—फाइल उसी नेटवर्क ड्राइव (\myorg.network\users$\exams\examacc) में सेव है। लेकिन सर्वर पर गायब! नेटवर्क भी ठीक, परमिशन भी सही, बाकी अकाउंट्स में कोई दिक्कत नहीं... तो आखिर माजरा क्या है?
यहाँ एक पाठक की टिप्पणी याद आती है—"कभी-कभी फाइल ऑफलाइन मोड में सेव होती है और नेटवर्क दोबारा मिलने पर ही सर्वर को दिखती है।" लेखक (OP) भी मान गए, "शायद यही वजह थी।"
जुगाड़, दौड़-धूप और प्रिंटर का कमाल
अब क्या करें? लेखक ने उसी वक्त अपने ऑफिस का लैपटॉप उठा लिया, जिसमें आर्ट ऑफिस का फोटो प्रिंटर पहले से मैप था। "छापो! दौड़ो! भागो आर्ट ऑफिस!"—और आखिरकार फाइल फोटो पेपर पर छप गई। फाइल डिजिटल ना सही, कागज पर तो मिल ही गई। भारतीय स्कूलों में भी जुगाड़ वाला यही अंदाज़ खूब चलता है—"कुछ भी करो, बस रिजल्ट आ जाए।"
असली सच: नेटवर्क से कटी पतंग
फिर भी डिजिटल कॉपी चाहिए थी। लेखक ने एडमिन खाते से लॉगिन किया, सोचा, शायद फाइल C:\users\examacc\Documents में मिल जाए। लेकिन वहाँ भी नदारद! लैपटॉप पर दिख रही थी, नेटवर्क पर नहीं। तभी दिमाग में बिजली कौंधी—"कहीं नेटवर्क ही तो गड़बड़ नहीं?"
नेटवर्क केबल लगाई, फाइल सेव की... और लो! अब सर्वर पर फाइल दिख गई! यानी सारा खेल नेटवर्क का था। कंप्यूटर ने तो साफ झूठ बोल दिया—फाइल सेव होने की झूठी तसल्ली दी।
यहाँ एक और पाठक बोले, "कंप्यूटर तो ऐसे झूठ बोलते हैं कि ब्रह्मांड के नियम ही सवालों में पड़ जाएं!" एक भारतीय पाठक होता तो ज़रूर कहता—"कंप्यूटर बाबू, ये तो तुमने बड़ा धोखा कर दिया!"
पाठक की राय और मजेदार टिप्पणियाँ
कई पाठकों ने सलाह दी कि ऐसे मामलों में ऑफलाइन फाइल सेटिंग्स भी देखनी चाहिए। कोई बोला, "कम्प्यूटर की दुनिया में हर चीज़ की एक छुपी हुई जगह होती है—जैसे हमारे घरों में पुराने दस्तावेज़ अलमारी के पीछे छुपे मिलते हैं।"
एक और पाठक ने मजाकिया अंदाज़ में कहा, "ऐसी घटनाओं पर तो एक अलग ऑपरेटिंग सिस्टम बनना चाहिए, ताकि ये झमेले न हों!" इस पर दूसरे ने चुटकी ली—"बूटेबल नहीं, बुक करने लायक!"
निष्कर्ष : कंप्यूटर और इंसान—दोनों से संभल के!
आखिर में लेखक यही कहते हैं—कंप्यूटर को एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की ज़रूरत नहीं, वो वैसे ही झूठ बोलना सीख गए हैं! परीक्षा के दिनों में आईटी वालों की हालत वैसे ही पतली रहती है, ऊपर से कंप्यूटर का जादू—समझिए, "आ बैल मुझे मार" वाली बात हो जाती है।
तो अगली बार जब आपके ऑफिस में या कॉलेज में कंप्यूटर गड़बड़ करे, तो याद रखिए—कंप्यूटर भी कभी-कभी मासूम बच्चों की तरह झूठ बोल देते हैं। बस, धैर्य रखिए, जुगाड़ लगाइए, और हंसी मज़ाक के साथ समस्या सुलझाइए।
क्या आपके साथ भी कंप्यूटर ने कभी ऐसा मज़ाक किया है? कमेंट में जरूर बताइए और इस कहानी को अपने आईटी दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: They lie to you