कैंपिंग में शिकायती इंटर्न को मिला मज़ेदार सबक – छोटी बदला कहानी
क्या आपने कभी किसी ऐसे सहकर्मी के साथ वक्त बिताया है जो हर छोटी बात में शिकायत करने से बाज़ नहीं आता? अगर हाँ, तो आज की ये कहानी आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर ले आएगी! अमेरिका की एक रेन फेयर (Renaissance Fair) में घटी इस घटना में, कुछ साथियों ने अपने नाक में दम कर देने वाले इंटर्न को बड़े ही मज़ेदार और मासूम अंदाज में सबक सिखाया। आइए जानते हैं कैसे!
कहानी की शुरुआत – जब प्लानिंग धरी रह गई
कहानी की मुख्य किरदार हैं मैरी, टॉड, मेगन और हमारे प्यारे इंटर्न – सांतो। दरअसल, इन लोगों का एक छोटा-सा कारोबार है – वे देशभर की रेन फेयर में खुद का डिज़ाइन किया हुआ लेदर गियर बेचते हैं। सो, तीन हफ्ते के कैंपिंग और कारोबार के लिए ये लोग अपने RV (यानि चलता-फिरता घर) में एक नए मेले में पहुँचे।
अब भारतीय मेले की तरह, यहाँ भी सब कुछ योजना के मुताबिक हो – ये जरूरी नहीं। आयोजकों ने RV के लिए जगह तो बुक कर ली, पर उतनी जगह ही नहीं थी! मजबूरन, इन्हें एक सुनसान मैदान के बीच अपना डेरा डालना पड़ा – बिना बिजली, पानी, सीवेज के। यानी RV भी अब पक्के घर की बजाय लोहे की टेंट बन गई थी।
इंटर्न की नॉन-स्टॉप शिकायतें – ‘ये क्या हाल बना रखा है!’
हमारे सांतो बाबू को न जाने क्यों, हर बात से शिकायत थी। गर्मी ज्यादा, काम ज्यादा, सुविधाएँ कम – हर चीज़ में नुक्स। जैसे हमारे दफ्तर में वो एक सहयोगी होता है, जो AC कम हो तो भी बड़बड़ाता है, चाय में चीनी ज्यादा हो तो भी! मैरी और बाकी साथी भी परेशान थे, मगर भारतीय कहावत है – ‘जो है, सो है’; माहौल हल्का रखने के लिए सब हँसी-मज़ाक से काम चला रहे थे।
लेकिन सांतो की शिकायतों ने सबका मूड खराब कर रखा था। एक कमेंट ने तो बढ़िया ताना मारा – "कभी-कभी लोगों को खुद के रोने-धोने का एहसास करवाना ज़रूरी हो जाता है!"
बारिश, अंधेरा और एक ‘प्यारी’ बदला योजना
दिन भर की भागदौड़ के बाद अचानक झमाझम बारिश शुरू हो गई। सांतो ने ऐलान किया – ‘मुझे नहाना है! पानी कब मिलेगा?’ टॉड ने झट से जवाब दिया, “जैसे ही कोई छत पर चढ़कर वाटर सिस्टरन खोल देगा।”
सांतो चौंका – “कौन सा सिस्टरन?”
मेगन ने भी रंग में रंगते हुए कहा, “अरे छत पर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए सिस्टरन रखा है, जब नल नहीं होता तो वहीं से पानी लेते हैं।”
मैरी ने बात और पक्की करने के लिए मज़े से जोड़ा, “तुमने बेडरूम की छत में जो क्रैंक देखा है, वही सिस्टरन खोलने के लिए है।” (असल में वह टीवी एंटीना के लिए था!)
सांतो उलझन में पड़ गया। थोड़ी बहस के बाद, बेचारे ने मान भी लिया कि उसे छत पर चढ़कर ही नहाने का इंतज़ाम करना होगा। जूते उतारे, पैंट मोड़ी और कड़कड़ाती बारिश में निकल पड़ा। जाने से पहले आखिरी बार मुड़ा और बोला, “सच में मज़ाक तो नहीं कर रहे न?”
सब एक स्वर में बोले, “नहीं भाई, मज़ाक नहीं!”
और फिर ठहाका लगाते हुए बोले, “हां, मज़ाक ही कर रहे हैं – कैसी रही बारिश वाली शावर?”
‘छोटी बदला’ या हल्की-फुल्की शरारत?
इस पूरे वाकये में कोई बुरी भावना नहीं थी। ये एकदम वैसा ही था जैसे ऑफिस में कोई बार-बार शिकायत करे और एक दिन उसके साथ हल्की-फुल्की शरारत कर दी जाए कि उसे खुद अपनी हरकतों का एहसास हो जाए।
रेडिट के एक यूज़र ने बड़े ही मज़ेदार ढंग से लिखा – "बारिश की फुहारों के साथ गाना गाने का मन कर रहा है, ‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन...’"
दूसरे ने कहा, "वाह, क्या जवाबी चाल थी!"
एक ने तो साफ लिखा, "अच्छा है कि आपने वाकई उसे छत पर चढ़ने नहीं दिया, वरना मामला गड़बड़ा सकता था।"
सांतो का क्या हुआ? अगले दिन से वह थोड़ा शांत ज़रूर हुआ, लेकिन मासूमियत कम नहीं हुई।
भारत में ऐसी 'पेटी रिवेंज' कैसे काम करती?
हमारे यहाँ भी ऑफिस, कॉलेज या परिवार में ऐसे 'शिकायती लाल' मिल ही जाते हैं। कभी-कभी ऐसे हल्के-फुल्के मज़ाक ही रिश्तों में मिठास घोल देते हैं और सबको हँसने का मौका भी मिल जाता है।
जैसे पुराने ज़माने में घर के बड़े बच्चों को नए बच्चे को 'पानी का हैंडपंप' चलाने भेजना, या 'रंगीन दूध' का झूठा वादा कर बच्चों को रंग डालना – ऐसी मासूम शरारतें हर भारतीय ने देखी-सुनी हैं।
निष्कर्ष – थोड़ी शरारत, थोड़ी सीख
कहानी से यही सीख मिलती है – शिकायत करने से समस्या हल नहीं होती, कभी-कभी माहौल को हल्का रखना और मज़ाकिया अंदाज में चीजें लेना भी जरूरी है। ऑफिस हो या घर, हल्की-फुल्की शरारतें रिश्तों को मजबूत करती हैं – बस ध्यान रहे कि सीमा न लांघें।
आपके साथ भी कभी ऐसा वाकया हुआ है? या आप भी किसी ‘सांतो’ को जानते हैं? नीचे कमेंट में जरूर बताइए, और अगर कहानी पसंद आई हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: Camping revenge