ऑफिस में सुस्ती का अंजाम: जब 'लेज़ी सुज़ी' को मिली असली सज़ा
हर ऑफिस में एक न एक ‘लेज़ी सुज़ी’ जरूर होती है — वो सहकर्मी जिसे काम करने से ज्यादा बहाने बनाने में मज़ा आता है। और जब ऐसे लोग दूसरों का काम और वक्त दोनों बर्बाद करते हैं, तो किसी न किसी दिन उनकी पोल खुल ही जाती है। आज की कहानी एक ऐसी ही ‘सुज़ी’ की है, जिसकी सुस्ती और बहानेबाज़ी ने उसे खुद ही अपनी नौकरी से निकाल बाहर किया।
जब काम का बोझ बढ़ा और भरोसा टूटा
हमारे कहानी के नायक, एक मेहनती एडमिन असिस्टेंट हैं, जिनकी ड्यूटी पांच प्रोफेशनल्स के साथ थी। काम का बोझ इतना ज्यादा था कि उन्हें ओवरटाइम करना पड़ता था। ऐसे में, उन्होंने अपने ऑफिस की 'लेज़ी सुज़ी' पर भरोसा किया, जो केवल तीन लोगों को सपोर्ट करती थी और ज्यादातर खाली बैठी रहती थी। लेकिन जैसे ही दो दिन बाकी बचे, सुज़ी ने सारा काम वापिस उनकी टेबल पर पटक दिया ये कहकर कि "मैं बहुत बिज़ी थी।"
अब भला, ऑफिस के माहौल में कौन नहीं जानता किसके पास कितना काम है? ये तो आग में घी डालने जैसा था। नायक समझ गए कि अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
पोल खुली... और ऑफिस में छा गया सन्नाटा
अब आई असली चालाकी की बारी। नायक ने सुज़ी के तीनों बॉस से जाकर हालचाल पूछा — "कोई एडमिन काम पेंडिंग है?" सबका एक ही जवाब — "अभी तो कुछ नहीं।" मतलब सुज़ी के पास सच में कोई काम नहीं था, फिर भी उसने झूठ बोल दिया।
फिर क्या, नायक ने अपने मैनेजर को सारी स्थिति समझाई। सोमवार की मीटिंग में जब मैनेजर ने सबके सामने पूछा कि ओवरटाइम क्यों करना पड़ा? नायक बोले - "सुज़ी से पूछिए, काम तो उनके पास था, उन्होंने ही लौटाया है।" सुज़ी ने वही पुराना बहाना दोहरा दिया - "मैं बहुत बिज़ी थी।"
अब तो भांडा फूटना ही था। मैनेजर ने पलटकर तीनों बॉस से पूछा — "कोई काम दिया था क्या?" सबने एक-दूसरे की शक्ल देखी — किसी ने भी सुज़ी को कोई काम नहीं दिया था। सुज़ी का चेहरा जैसे टमाटर हो गया, नजरें झुका लीं। ऑफिस में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया।
कम्युनिटी की प्रतिक्रिया: मजेदार टिप्पणियाँ और सीख
Reddit कम्युनिटी में इस कहानी ने खूब वाहवाही बटोरी। एक यूज़र ने बड़े मज़ेदार ढंग से लिखा, "भाई, आपने तो सुज़ी को खुद अपने ही जाल में फंसा दिया, मास्टरस्ट्रोक था ये!" (अर्थात खुद ही अपनी कब्र खुदवा दी)।
एक और ने कहा, "लेज़ी सुज़ी तो वैसे भी बेकार थी, कम से कम लेज़ी सुसन (जिसे हम भारत में गोल घूमने वाली ट्रे समझ सकते हैं) तो अपना काम ठीक से करती है!"
किसी ने लिखा, "ऑफिस में असली ताकत मैनेजमेंट के पास नहीं, बल्कि एडमिन असिस्टेंट्स के पास होती है। वे ही असली गेमचेंजर होते हैं!" और वाकई, हमारे देश में भी ऑफिस के पुराने बाबू या रजिस्ट्री वाले अंकल को नाराज़ करना मतलब अपनी फाइल अटका लेना।
एक कमेंट ने बड़े अच्छे से कहा, "सुज़ी को निकालना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि जब काम आएगा, तब तो असली आफत होगी।" कई लोगों ने ये भी नोट किया कि अक्सर मैनेजर काम की असली स्थिति से बेखबर रहते हैं, और ये एक सबक है कि मैनेजमेंट को अपने स्टाफ के काम पर नजर रखनी चाहिए।
कुछ लोगों ने हंसी में लिखा, "लेज़ी सुसन तो गुमाकर देखिए, लंच टेबल पे सबकी लड़ाई हो जाएगी, लेकिन लेज़ी सुज़ी के जाने से तो सबको राहत मिली!"
सुस्ती का अंत: खुद की खुदाई
इस पूरी घटना से साफ है कि कामचोरी और बहानेबाज़ी ज्यादा दिन नहीं चलती। सुज़ी की जगह नई भर्ती का इंटरव्यू अगले ही हफ्ते शुरू हो गया और महीने के अंत तक सुज़ी की छुट्टी हो गई। एक कमेंट में किसी ने सही ही कहा, "सुज़ी को किसी और ने नहीं, खुद ने ही फँसाया।"
हमारे देश में भी ऑफिस की चाय पर चर्चा हो या लंच ब्रेक, ऐसे किस्से खूब सुनने को मिलते हैं। फर्क बस इतना है कि यहाँ ‘सुज़ी’ का नाम ‘संदीप’, ‘राधा’ या ‘शर्मा जी’ भी हो सकता है। लेकिन सबक एक ही है — मेहनत से भागने वालों की पोल एक दिन जरूर खुलती है!
निष्कर्ष: आपकी टीम में भी कोई 'लेज़ी सुज़ी' है क्या?
दोस्तों, आप बताइए — क्या आपके ऑफिस या संस्था में भी कोई ऐसा है जो सुस्ती और बहानेबाज़ी में माहिर है? क्या आपने कभी किसी सुज़ी टाइप सहकर्मी को सबक सिखाया है? अपने मजेदार अनुभव नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें।
आखिरकार, काम का बोझ बराबरी से बांटना और ईमानदारी से निभाना ही किसी भी टीम की असली ताकत है। और हाँ, अगली बार जब कोई आपके हिस्से का काम भी टालने लगे, तो ये कहानी याद कर लीजिए — कभी-कभी सच सामने लाने के लिए बस एक छोटी-सी चाल काफी होती है!
मूल रेडिट पोस्ट: Got my lazy colleague got fired