ऑफिस में बदला लेने की ऐसी तरकीब, जिसे पढ़कर आप भी हंस पड़ेंगे!
ऑफिस की कहानियों में अक्सर किसी ने किसी की टांग खींची, मज़ाक या छोटी-मोटी शरारतें आम बात हैं। लेकिन सोचिए, अगर कोई आपके दिमाग के साथ ही खेल जाए? आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ एक ऐसी बदला-कहानी, जिसमें एक दोस्त ने अपने साथी को मानसिक स्तर पर इस तरह परेशान किया कि बेचारा खुद ही अपनी हकीकत पर शक करने लगा! और यकीन मानिए, ये कहानी जितनी मज़ेदार है, उतनी ही हैरान करने वाली भी।
जब बदले की आग ऑफिस में लगी
इस कहानी की शुरुआत होती है दो ऐसे साथियों से, जो किसी ढाबे या कैफे में साथ काम करते थे। उनमें से एक (जिसे हम 'जोएल' कहेंगे), हमेशा अपने दोस्त की चीज़ें इधर-उधर कर देता था – जैसे आपकी चाय की प्याली, नोटबुक या स्पैचुला (रसोई का सामान) थोड़ी देर के लिए गायब कर देना, फिर चुपचाप वहीं रख देना जहाँ आपने छोड़ा था। हमारा नायक धीरे-धीरे खुद पर और अपनी याददाश्त पर शक करने लगा। आखिरकार, उसने जोएल को रंगे हाथों पकड़ लिया! और वहीं पर उसने चेतावनी दी – "चेतावनी देता हूँ, बदला जरूर लूंगा!" पर दोस्त को लगा मज़ाक है, या शायद उसने भूल ही गया।
"जागो, तुम्हें जागना है!" – मन के खेल की शुरुआत
कुछ हफ्तों बाद, बदले की घड़ी आ गई। अब हमारी कहानी के हीरो ने 'Futurama' नामक एक विदेशी कार्टून शो से आइडिया लिया (जैसे हमारे यहाँ 'शक्तिमान' या 'भूत अंकल' देखकर बच्चों को शरारतें सूझती हैं)। जैसे ही शिफ्ट शुरू हुई, उसने नई चाल चली – जब भी जोएल उससे बात करता, और नजरें कहीं और होतीं, वो धीरे से कान में फुसफुसाता, "मुझे जरूरत है, तुम जाग जाओ!" आवाज़ इतनी धीमी, कि लगे कहीं कोई सपना देख रहा है। धीरे-धीरे ये फुसफुसाहट थोड़ी तेज़ हुई, लेकिन हमेशा इतने हल्के अंदाज़ में कि जोएल को लगे उसके आसपास कुछ गड़बड़ है।
शुरुआत में तो जोएल ने समझा कि मज़ाक चल रहा है, लेकिन जब बार-बार इन्कार और नकली गुस्सा देखने को मिला, उसे खुद पर शक होने लगा। कहानी में और रंग भरने के लिए एक अन्य सहकर्मी 'ब्रैंडी' भी शामिल हो गई – उसने एक बार तो जोएल की आंखों में आंखें डालकर यही लाइन कह दी। बेचारा जोएल परेशान!
जब हकीकत और सपना गड्डमड्ड हो गए
अब जोएल कभी खुद को चुटकी काटता, कभी दीवारों को घूरता, कभी छोटे-छोटे सामान को उठाकर छोड़ता कि कहीं कुछ अजीब तो नहीं हो रहा। यहाँ तक कि वो खुद को सच साबित करने के लिए गरम तले (फ्रायर) में हाथ डालने ही वाला था, तब हमारे नायक ने फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया। तब जाकर उसे यकीन दिलाया – "भाई, तू असल में है, सपना नहीं देख रहा!"
इस रचनात्मक बदले की सबसे मजेदार बात ये थी कि एक कमेंट करने वाले ने लिखा, "तुम तो राक्षस निकले, मज़ा आ गया!" और खुद कहानीकार ने हँसते हुए जवाब दिया – "पूरी तरह मुनाफा रहा!" एक और पाठक ने तो यहाँ तक कह दिया, "ये तो मास्टरक्लास है बदले की!" कई पाठकों को ये कहानी 'गैसलाइटिंग' यानी किसी के दिमाग से खेलना लगी – पर ऑफिसों में ऐसी शैतानियां कई बार देखने को मिलती हैं, कभी छुट्टी लेने के बहाने, कभी मुँहबोले बॉस के नाम से फर्जी ईमेल भेजकर।
ऑफिस की संस्कृति और हमारी छोटी-छोटी बदले की कहानियाँ
हमारे देश में भी ऐसे किस्से खूब होते हैं – कोई आपके टिफिन से परांठा गायब कर दे, तो आप उसके झोले में छुपाकर मिर्ची का अचार डाल दें। या कोई साथी हमेशा जोर-जोर से चाय सुड़कता है, तो अगली बार उसकी चाय में थोड़ा सा नमक डाल दें। एक पाठक ने बताया – "हमारे ऑफिस में एक साथी सोचता था वो सिमुलेशन में है, तो हम सब उसके सामने दीवार की तरफ घूरते रहते, वो बेचारा घबरा गया।" और आखिरकार जब उसने मिन्नत की, तो सबने शांति से कहा – "अब ज़रा अपनी कॉफी धीरे-धीरे पियो।"
इस कहानी का असली मज़ा तब आया जब बदले के बाद, जोएल पूरी रात नहीं सो पाया! अगले दिन वो लाल-आँखें लेकर आया और बोला – "अब फिर कभी ऐसी हरकत मत करना, रात भर नींद नहीं आई, डर था कि कहीं सपना चल रहा हो!" उस पर हीरो ने मुस्कराकर कहा – "फिर मेरी चीज़ें मत छुपाना!" और दोनों ने तगड़ा समझौता कर लिया – अब कोई बड़ा मानसिक खेल नहीं, सिर्फ हल्के-फुल्के मज़ाक ही चलेंगे।
निष्कर्ष – बदला भी कला है!
कहानी से सीख यही है कि बदला लेना हो तो थोड़ा रचनात्मक बनो – लेकिन हद से ज़्यादा मत बढ़ो। ऑफिस की शरारतें दोस्ती में मिठास तो घोलती हैं, पर किसी की हद से बाहर जाएं तो नुकसान भी हो सकता है। इस कहानी के नायक की तरह अगर आप भी कभी किसी से बदला लें, तो ध्यान रखें कि दोस्ती बनी रहे – और साथ में हँसी-ठिठोली भी!
अब आप बताइए – क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसी मजेदार बदले की घटना हुई है? या आपको किसका बदला सबसे यादगार लगा? कमेंट में ज़रूर बताएं और अपनी कहानी शेयर करें, ताकि हमारी यह छोटी सी बदला-गाथा और रंगीन हो जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: I psychologically tortured a friend at work one night.