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ऑफिस की राजनीति और ब्रुकलिन: जब मैंने ‘ब्रुकलिन’ को ही नकार दिया!

कॉर्पोरेट ऑफिस में भ्रमित व्यक्ति की कार्टून-3D चित्रण, ब्रुकलिन के बारे में सोचते हुए।
इस जीवंत कार्टून-3D दृश्य में, हमारा नायक कॉर्पोरेट मेडिकल ऑफिस के अनुभव पर विचार करता है, मजेदार तरीके से ब्रुकलिन और उसमें समाने की चुनौतियों पर सवाल उठाता है।

ऑफिस की राजनीति का स्वाद अगर आपने चखा है, तो आप जानते होंगे कि यहाँ हर दिन कोई-न-कोई नया नाटक चलता रहता है। कभी कोई आपकी चाय पी जाता है, कभी कंप्यूटर के माउस में बैटरी निकाल लेता है – और फिर शुरू होता है बदले का सिलसिला! आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – हल्की-फुल्की बदमाशी, थोड़ी-सी चिढ़ और खूब सारी हँसी!

जब ‘ब्रुकलिन’ बन गया ऑफिस का मुद्दा

ये किस्सा है एक मेडिकल ऑफिस का, जहाँ सबकुछ बहुत कॉर्पोरेट स्टाइल में चलता था – मतलब, चेहरे पर मुस्कान, दिल में जलन! हमारे मुख्य किरदार (आइए इन्हें हम ‘राजू’ ही कह लें), अपनी नौकरी में मगन रहते थे, लेकिन एक सहकर्मी (मान लीजिए ‘माया’ नाम रख लें) को उनसे बेइंतहा चिढ़ थी। अब हर ऑफिस में ऐसा कोई न कोई तो होता ही है, जो बिना वजह आपकी टांग खींचने पर तुला रहता है।

माया रोज़ कोई-न-कोई छोटी हरकत करती – कभी राजू का मॉनिटर-अनप्लग कर देती, कभी जरूरी दस्तावेज़ छोड़ देती ताकि बॉस की डाँट राजू को ही पड़े। अब भैया, इतना सहने के बाद मन में तो आता ही है, “अब तो कुछ करना पड़ेगा!”

बदले की अजीबोगरीब तरकीब: ब्रुकलिन क्या होता है?

माया की पूरी शख्सियत बस एक ही बात पर टिकी थी – “मैं ब्रुकलिन से हूँ!” जैसे हमारे यहाँ कुछ लोग हर बात में “मैं दिल्ली वाला हूँ” या “मैं बनारसी हूँ” घुसेड़ देते हैं, वैसे ही माया के लिए ब्रुकलिन ही सबकुछ था। “अरे, मैं ब्रुकलिन से हूँ, मुझे असली पिज्ज़ा पता है!” या “ब्रुकलिन वाले ऐसे नहीं सहते!” वगैरह-वगैरह।

राजू ने भी सोचा, इस बार इसका इलाज ‘पेटी’ बदले से करते हैं। उन्होंने पूरे दिन ऐसे दिखाया कि उन्हें ‘ब्रुकलिन’ नाम की कोई चीज़ पता ही नहीं! “ब्रुकलिन? वो कहाँ है? ओहियो में कोई गाँव है क्या?” “न्यूयॉर्क में? वो तो ऊपर की तरफ है ना, अपस्टेट?” “न्यूयॉर्क में तो सिर्फ चार ही बरो हैं – मैनहैटन, क्वीन, ब्रॉन्क्स, स्टेटन आइलैंड – ब्रुकलिन कोई इंटरनेट का मज़ाक है क्या?”

माया बुरी तरह झल्ला गई! इंटरनेट पर दिखाकर भी समझाने लगी, पर राजू टस से मस नहीं हुए – “अरे छोड़िए, ये सब इंटरनेट का झाँसा है, असली ब्रुकलिन होता ही नहीं!” सोचिए, कोई आपके सामने आपकी खुद की पहचान को नकार दे – गुस्सा आना तो लाजिमी है!

कम्युनिटी की मजेदार प्रतिक्रियाएँ: “ये तो असली जले पर नमक!”

Reddit पर इस कहानी ने धूम मचा दी। कई लोग बोले, “भैया, ये तो वही बात हो गई जैसे कोई दिल्ली वाले को कह दे – ‘दिल्ली? वो कहाँ है? बिहार में है क्या?’” एक कमेंट में किसी ने हँसी-मजाक में लिखा, “ब्रुकलिन? अरे वो तो मिनेसोटा का एक गाँव है, सुना है वहाँ की हालत खराब है!”

एक और ने बढ़िया सलाह दी – “असल में बदला तो तब पूरा हुआ जब तुमने वो ऑफिस ही छोड़ दिया। ऐसे टॉक्सिक माहौल से निकलना ही असली जीत है!” ये सच है; अक्सर हम सोचते हैं कि सामने वाले को बदलेंगे, पर असली राहत हमें खुद को उस माहौल से निकालकर मिलती है।

एक मजेदार कमेंट में किसी ने लिखा – “मेरे पापा भी ब्रुकलिन के हैं और उन्होंने पूरी ज़िंदगी यही जताया कि असली स्टाइल, असली खाना, असली समझदारी – सब बस ब्रुकलिन वालों के पास है! पर मज़ा तब आया जब कभी ले ही नहीं गए ब्रुकलिन घुमाने।”

हमारे यहाँ भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जो हर बात पर अपने शहर की डींग हाँकते हैं – “ये स्वाद तो सिर्फ अमृतसर के छोले-भटूरे में है” या “अरे, असली तेवर तो लखनऊ वालों के होते हैं!” और अगर आप अचानक कह दें, “अरे, लखनऊ? वो कहाँ है, नेपाल में?” – सामने वाला भड़क ही जाएगा!

जब मज़ाक ही बन जाए हथियार

कुछ कमेंट्स में लोगों ने अपने अपने अनुभव भी साझा किए – जैसे किसी ने अपने दोस्त को सालों तक यकीन दिला दिया कि “McDonald's” नाम की कोई चीज़ ही नहीं होती, या किसी का स्कॉटिश पति जब उसे इंग्लिश कह दे तो हंगामा हो जाता है!

ऐसे हल्के-फुल्के मज़ाक एक तो माहौल को मज़ेदार बनाते हैं, दूसरा, सामने वाले की ‘मैं ही सब जानता/जानती हूँ’ वाली सोच का इलाज भी कर देते हैं।

हमारे यहाँ भी दफ्तरों में छोटी-छोटी हरकतों से बदला लेना आम है – जैसे किसी की टेबल पर छुपकर पानी की बोतल बदल देना, या डब्बे में चीनी की जगह नमक भर देना। लेकिन ये सब प्यार-मज़ाक की हद में रहे तो ही अच्छा लगता है।

निष्कर्ष: आपकी ‘ब्रुकलिन’ क्या है?

कहानी से सीखने वाली बात ये है कि कभी-कभी हल्के-फुल्के बदले भी बहुत सुकून दे सकते हैं, लेकिन असली जीत तब होती है जब आप खुद को नेगेटिव माहौल से निकाल लेते हैं। साथ ही, किसी भी शहर या पहचान को लेकर बहुत घमंड करना, कभी-कभी उल्टा भी पड़ सकता है।

तो अगली बार जब कोई आपके सामने अपने गृहनगर की शान बघार रहा हो, तो ज़रा हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ ही लीजिए – “वो कहाँ है? पाकिस्तान में?” फिर देखिए, मज़ा कैसे आता है!

आपके ऑफिस में भी ऐसा कोई किरदार है? या आपने कभी ऐसा मज़ेदार बदला लिया है? कमेंट में ज़रूर बताएँ – चलिए, आज सबका ‘ब्रुकलिन’ ढूँढते हैं!


मूल रेडिट पोस्ट: I pretended to not know what Brooklyn is.