ऑफिस की राजनीति और छोटी बदला: फ्लेक्सी-टाइम का खेल और करारा जवाब
ऑफिस की दुनिया भी किसी पारिवारिक ड्रामे से कम नहीं होती! कभी बॉस के ताने, कभी सहकर्मियों की जलन, तो कभी चाय के ब्रेक पर होने वाली गॉसिप—सबकुछ मसालेदार। लेकिन जब बात आती है अपने हक के लिए खड़े होने की, तो कई बार सबसे अच्छा बदला वही होता है, जो सामने वाले को खुद उसकी गलती का अहसास करा दे। आज की कहानी एक ऐसे ही कर्मचारी की है, जिसने अपने ऑफिस की "फ्लेक्सी-टाइम" ड्यूटी का पूरा फायदा उठाया—और जब जलनखोर टीम ने उसकी आज़ादी छीननी चाही, तो उसने ऐसा दांव चला कि सबकी बोलती बंद हो गई!
फ्लेक्सी-टाइम: आज़ादी या आफ़त?
हमारे नायक एक बड़े ऑफिस में काम करते थे, जहाँ हर डिपार्टमेंट को ये छूट थी कि वे चाहें तो फ्लेक्सी-टाइम चुन सकते हैं। मतलब, सुबह जल्दी आओ या देर से, बस 10 बजे से 4 बजे तक ऑफिस में रहना ज़रूरी था। बाकी समय में फोन कवर करना ज़रूरी था, लेकिन कब आओ-कब जाओ, उसमें आज़ादी थी। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे हमारे यहाँ कुछ ऑफिस में "फुल डे" और "हाफ डे" का सिस्टम होता है—बस, यहाँ थोड़ी और आज़ादी थी।
हमारे नायक सबसे दूर रहते थे, तो ट्रैफिक से बचने के लिए रोज़ सुबह 8 बजे आ जाते और 4 बजे निकल जाते। चार साल तक किसी को कोई परेशानी नहीं हुई, सब बढ़िया चला। लेकिन जैसे ही डिपार्टमेंट बदला, कहानी में ट्विस्ट आ गया।
जब टीम को होने लगी "जलन"
नए डिपार्टमेंट में सबको ये बात चुभने लगी कि ये साहब रोज़ 4 बजे निकल जाते हैं, जबकि बाकी सब 5 बजे तक रुकते हैं। अजीब बात ये थी कि इससे किसी का कोई नुकसान नहीं था—फोन कवर भी हो जाता, काम भी टाइम पर। फिर भी, "क्योंकि सब रुकते हैं, तो तुम भी रुको" वाली मानसिकता हावी हो गई। मैनेजर ने सबको समझाया—"अगर चाहो तो तुम भी 4 बजे जा सकते हो, या रोटेशन बना लो"—लेकिन किसी ने राज़ी नहीं होना था, नहीं हुए। ऑफिस की राजनीति में यही तो मज़ा है—खुद को नुकसान कर लो, पर सामने वाले को छूट मत दो!
एक कमेंट में किसी ने सही लिखा—"फ्लेक्सी-टाइम की आज़ादी सबको प्यारी है, जब तक उसका असली मतलब समझ में ना आ जाए।"
गेम बदल गया: सबसे बढ़िया बदला
अब नायक ने फैसला लिया—"अगर टीम चाहती है कि सब एक ही टाइम पर काम करें, तो ठीक है।" मीटिंग में सबने मिलकर कहा, "हाँ, 9 से 5 सबको एक साथ काम करना चाहिए।" मैनेजर ने उसी वक्त फैसला लागू कर दिया—फ्लेक्सी खत्म, अब सब 9 से 5।
और यहीं आया असली ट्विस्ट! उस समय दुनिया में एक बड़ा खेल महोत्सव चल रहा था (जैसे हमारे यहाँ IPL या क्रिकेट वर्ल्ड कप)। टाइम डिफरेंस के कारण मैच सुबह होते थे, तो टीम वाले आराम से मैच देखकर 10 बजे ऑफिस आ जाते थे। लेकिन अब? अब सबको 9 बजे हाज़िर होना था! ऊपर से सुबह 9-10 तक फोन उठाने का काम भी अब सबको बांटना पड़ा, क्योंकि पहले अकेले हमारे नायक ये काम करते थे।
एक कमेंट में किसी ने चुटकी ली—"जो खुदाई में गड्ढा खोदते हैं, वही उसमें गिर जाते हैं!"
और तो और, लंच टाइम में जो मैच देखने का प्लान था, अब उसमें भी सिर्फ एक घंटा मिला। पहले नायक लंच छोड़कर फोन कवर करते थे, अब उन्होंने साफ कह दिया—"अगर सब बराबर हैं, तो मैं भी लंच लूंगा।" मतलब, मैच देखने का मज़ा भी फीका।
करमा और किस्मत: असली जीत किसकी?
कहते हैं, "जैसी करनी, वैसी भरनी।" टीम ने नायक की आज़ादी छीनकर खुद का ही नुकसान कर लिया। ऊपर से किस्मत भी देखिए—ऑफिस की लोकेशन बदल गई, और नया ऑफिस नायक के घर के पास खुल गया। अब वो पैदल जा सकते थे, ट्रैफिक की झंझट भी खत्म, पेट्रोल का खर्चा भी बच गया।
एक कमेंट में बढ़िया लिखा—"हार में भी जीत कैसे हासिल की जाती है, ये सीखना हो तो इस कहानी से सीखो!" वहीं एक और कमेंट ने कहा—"कभी-कभी सबसे अच्छा बदला यही है कि सामने वाले को वही दे दो, जो वो माँग रहा है।"
हमारे यहाँ एक कहावत है—"अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना"—बस, टीम ने भी वही किया।
पाठकों के लिए सवाल: क्या आपने भी कभी ऐसा बदला लिया?
तो दोस्तों, इस कहानी से हमें ये सिखने को मिला कि ऑफिस में हर किसी की सुविधा और मेहनत की कद्र करनी चाहिए। "सबको बराबर बनाना" कभी-कभी खुद के लिए ही भारी पड़ जाता है।
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, जब किसी की छोटी सोच ने बड़ा नुकसान किया हो? या आपने भी कभी "चुपचाप" किसी को उसकी ही चाल में फँसा दिया हो? अपनी कहानी नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें—शायद अगली बार आपकी कहानी भी यहाँ छप जाए!
अंत में, एक पाठक ने लिखा था—"अगर आप अपने ही चावल में पानी डाल देंगे, तो स्वाद खुद ही बिगड़ जाएगा!" सोचिए, ऑफिस में वही हाल क्यों होता है...
मूल रेडिट पोस्ट: Workplace revenge