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ऑफिस की बेवकूफी भरी पॉलिसी: जब नियम मानना ही जुर्म बन गया

कॉल सेंटर टीम लीड सख्त सुरक्षा नीतियों को लागू करते हुए, फिल्मी माहौल में।
कॉल सेंटर लीडर्स के सामने आने वाली चुनौतियों का फिल्मी चित्रण करते हुए, यह चित्र सुरक्षा नीतियों को लागू करने के तनाव को दर्शाता है, जो कभी-कभी अत्यधिक लग सकता है। कार्यस्थल के नियमों में ओवरकॉरेक्शन के प्रभावों की खोज करें और टीम डायनामिक्स पर इसके वास्तविक जीवन में प्रभाव को समझें।

सोचिए, आप अपने ऑफिस में मेहनत कर रहे हैं, सब कुछ नियमों के हिसाब से कर रहे हैं, और जब आप नियम का पालन करते हैं तो आपको ही डाँट पड़ जाती है! कुछ ऐसा ही हुआ एक बैंक के कॉल सेंटर में, जहाँ ओवर-एक्शन में बनाई गई एक पॉलिसी ने सबकी नाक में दम कर दिया। कहानी में नायक ने अपनी ईमानदारी से काम किया, लेकिन उल्टा उसी को सजा मिल गई। क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसा ऊल-जुलूल नियम बना है?

नियमों की अति और भारतीय ऑफिसों की यादें

हमारे यहाँ अक्सर सुना जाता है—"नियम कानून सबके लिए समान हैं", पर असल में ये सिर्फ कहने की बातें होती हैं। बहुत जगहों पर नियम बनते तो हैं, पर उनका पालन करवाने वाले खुद सबसे ज़्यादा लापरवाह होते हैं। Reddit के इस किस्से में भी यही हुआ। कॉल सेंटर में हर कर्मचारी को कहा गया कि डेस्क पर कोई भी व्यक्तिगत चीज़, चाहे वो फोटो हो या छोटा-सा शोपीस, सिर्फ एक छोटी शेल्फ पर ही रखना है। बाकी सब कुछ लॉक करके रखना होगा, वरना सख्त कार्यवाही!

अब सोचिए, अपने डेस्क पर परिवार की फोटो, बच्चों की ड्राइंग या गणेश जी की छोटी मूर्ति रखना भी अपराध हो जाए तो क्या हाल होगा? कार्यालय में माहौल तो ऐसे ही बन जाता है जैसे स्कूल में हेडमास्टर घूम रहे हों। एक कमेन्ट में तो किसी ने मज़ाक में कहा कि "क्या आपके मैनेजर को लगा था कि वो प्री-स्कूल के टीचर हैं?"

'नियम तोड़ो मत, वरना पछताओगे!' – जब ईमानदारी का इनाम मिला

कहानी के नायक, जो टीम लीडर थे, ने जब नई पॉलिसी का मजाक उड़ाया कि "ये अब तक की सबसे बेवकूफी वाली पॉलिसी है, कोई मानेगा नहीं", तो अगले ही दिन उन्हें नोटिस थमा दिया गया! मजेदार बात ये थी कि उनके बॉस को खुद भी पॉलिसी में भरोसा नहीं था, पर उनके ऊपर वाले अधिकारी की नजर में गिरने के डर से, उन्होंने कार्रवाई कर दी। ऐसे में एक पाठक ने लिखा, "बिल्कुल वैसे ही जैसे स्कूल में क्लास टीचर अपने फेवरिट्स के साथ अलग व्यवहार करती थी।"

लेकिन असली ट्विस्ट तब आया जब नायक ने शनिवार को डेस्क चेकिंग की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने पूरी ईमानदारी से हर छोटे-बड़े नियम उल्लंघन को नोट किया—परिणामस्वरूप दर्जनों उल्लंघन सामने आए! ज़्यादातर लोग पॉलिसी को गंभीरता से ले ही नहीं रहे थे। उन्होंने बिना कोई निजी राय या तंज़ मारे, सिर्फ फैक्ट्स लिखे। सोमवार आते-आते, उन्हें फिर से फॉर्मल वॉर्निंग मिल गई! एक पाठक ने तो यहाँ तक लिखा, "ये तो वही बात हो गई—नियम मानो तो भी फँसो, ना मानो तो भी फँसो!"

ऑफिस पॉलिटिक्स: ‘ऊपर वाले’ की कृपा और नीचे वालों की आफत

हमारे देश के दफ्तरों में सियासत का रंग कुछ अलग ही होता है। ऊपर वाले अफसर के मूड के हिसाब से ही कभी-कभी नियम बदल जाते हैं। यहाँ भी नायक के बॉस ने सिर्फ अपने बॉस को खुश करने के लिए उन्हें डांट दिया, जबकि खुद भी जानते थे कि ये पॉलिसी कितनी बेहूदा है। एक पाठक ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की—"कंपनियों को जब तक नियम अच्छे लगते हैं, तब तक सब ठीक है, जैसे ही आप पूरी ईमानदारी से पालन करो, अचानक आप ही समस्या बन जाते हो।"

कई बार कर्मचारी HR के पास भी जाते हैं, लेकिन वहाँ भी अकसर "हम देखेंगे" के अलावा कुछ खास हासिल नहीं होता। खुद नायक ने भी माना कि HR से मदद लेना बेकार था, वरना शायद नौकरी भी जा सकती थी।

एक और मजेदार कमेंट था—"अगर आप 'सभी सम्मान के साथ' कहकर पॉलिसी की टांग खींच लेते तो शायद बात बन जाती!" बिल्कुल वैसे ही जैसे भारतीय दफ्तरों में हम कहते हैं—"सर, बुरा न माने, लेकिन..."

अंत भला तो सब भला?

आखिरकार, नायक ने अपनी नाराजगी खुद तक सीमित रखी और दूसरी टीम में ट्रांसफर होकर चैन की सांस ली। पॉलिसी भी धीरे-धीरे गायब हो गई, जैसे कभी थी ही नहीं। पुराने मैनेजर को जब ऑफिस वालों का साथ नहीं मिला, तो उन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा—काफी बाद में, पर कारण कुछ और था।

इस पूरे किस्से से यही सीख मिलती है कि ऑफिस के नियम कितने भी अजीब हों, अगर ऊपर वाले का मूड खराब हो, तो सीधा-साधा कर्मचारी ही फँसता है। और हाँ, अगर कोई बहुत टेढ़ी पॉलिसी आए, तो "सभी सम्मान के साथ" अपनी बात रखने में ही भलाई है!

आपके अनुभव क्या हैं?

क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसे उल्टे-पुल्टे नियम बने हैं? क्या आपको भी कभी नियम पालन करने के बावजूद डांट या नोटिस मिला है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें! कौन जाने, आपकी कहानी भी किसी को राहत दे दे या हँसा दे!


मूल रेडिट पोस्ट: A stupid policy was formed as an overcorrection, I was written up for enforcing it