ऑफिस की बिजली चोरी का इल्ज़ाम और एक चौकीदार की खुराफाती जवाबी कार्रवाई
क्या आप कभी ऐसी नौकरी में रहे हैं जहाँ काम से ज्यादा फुर्सत मिली हो? अब सोचिए, रात के समय खाली ऑफिस की सुरक्षा में तैनात हैं, चारों तरफ सन्नाटा, और नींद से बचने के लिए आपके पास बस किताबें या अपना मोबाइल! ऐसे में अगर आप अपने मोबाइल या टैबलेट को ऑफिस की बिजली से चार्ज कर लें, तो क्या ये चोरी मानी जाएगी? अब ज़रा सोचिए, इस ‘चोरी’ पर अगर मैनेजर आपको पकड़ ले तो क्या होगा?
बिजली की चोरी या मैनेजर की छोटी सोच?
यह कहानी है नीदरलैंड्स के एक सिक्योरिटी गार्ड की, जिन्होंने दो दशक तक रात की शिफ्ट में ऑफिस की सुरक्षा की। उनका असली मकसद था—अपने उपन्यास के ड्राफ्ट लिखना। जब बाकी गार्ड्स टीवी देखते, गेम खेलते या सुडोकू हल करते, ये जनाब अपने iPad और ब्लूटूथ की-बोर्ड पर जासूसी उपन्यास रचते थे। अब भैया, इतनी रात को कौन सा बॉस देखने आ रहा है कि आप क्या कर रहे हैं?
एक दिन उनके मैनेजर, जिन्हें उनसे कुछ निजी खुन्नस थी, ने उन्हें ऑफिस बुलाया। HR की मोहतरमा भी साथ थीं। सीधे-सीधे इल्ज़ाम लगाया गया—"तुम ऑफिस की बिजली चुरा रहे हो! अपनी डिवाइस चार्ज करना चोरी है।" अब हमारे नायक ने भी जवाब में कह दिया, "अगर आपको इल्ज़ाम लगाना है, तो सही लगाइए! मैंने चोरी नहीं, बल्कि 'embezzlement' किया है—क्योंकि ये बिजली मेरे रिसेप्शन एरिया की थी, मेरी निगरानी में थी। इसका फैसला डिसिप्लिनरी कमेटी करेगी और मैं अपने यूनियन रिप से बात करूंगा।"
बस, मैनेजर और HR के चेहरे देखने लायक थे! तुरंत इल्ज़ाम वापिस, और अगली बार कोई छेड़छाड़ नहीं।
चार्जिंग पर पाबंदी और टाइपराइटर की वापसी
मैनेजर की भड़ास अभी निकली नहीं थी, तो उन्होंने एक बड़ा सा बोर्ड लगा दिया—"कोई भी अपनी पर्सनल डिवाइस चार्ज नहीं करेगा"। अब ऑफिस के बाकी गार्ड्स भी परेशान, क्योंकि स्मार्टफोन चार्ज करना उनकी भी ज़रूरत थी। लेकिन हमारे सिक्योरिटी गार्ड ने नया तरीका निकाला—अगली रात टाइपराइटर लेकर पहुँच गए! न चार्जिंग की जरूरत, न मैनेजर की दखलअंदाजी।
बाकी गार्ड्स ने जब अपने फोन चार्ज करना चाहा और मना किया गया, तो बवाल मच गया। सब जगह शिकायतें पहुंचीं, और आखिर वो बोर्ड हटाना पड़ा। सब फिर से चैन से अपने फोन चार्ज करने लगे—और हमारे लेखक साहब ने फिर से iPad जोड़ा।
बिजली की असली कीमत और दफ्तर का असली नुक़सान
अब सोचिए, जिस बिजली को लेकर इतना हंगामा हुआ, उसकी कीमत क्या थी? एक कमेंट में किसी ने लिखा, "अगर 24 घंटे 50W का चार्जर भी चले, तो दिन भर में बमुश्किल 35-40 रुपये की बिजली खर्च होती है।" यानि एक साल के चार्जिंग का बिल, एक कॉर्पोरेट मीटिंग की चाय-समोसे से भी कम!
एक और पाठक ने बढ़िया तंज कसा—"अगर चोरी की भरपाई करनी है तो सिक्कों की बोरी में पैसे मैनेजर की मेज़ पर रख आओ और रसीद मांगो!" ऐसे में एक और साहब बोले—"हमारे ऑफिस में तो कोई रोज़ अपनी टेस्ला गाड़ी भी चार्ज करता है, उसपर कोई कुछ नहीं बोलता!"
मैनेजर का नाम उपन्यास में!
सबसे मज़ेदार तो वो जवाब था, जब मैनेजर ने पूछा—"तुम क्या लिखते हो?" गार्ड बोले—"सस्पेंस फिक्शन।" मैनेजर—"मैं हूँ उसमें?" गार्ड मुस्कराए—"बहुत थोड़ी देर के लिए।" असल में, उन्होंने अपने मैनेजर के नाम पर एक घिनौना किरदार रचा, जिसे उनकी कहानी का नायक ठिकाने लगा देता है! वाह, क्या बदला!
दफ्तर की मानसिकता और हमारे दफ्तरों की सीख
ये कहानी सिर्फ बिजली की चोरी या उपन्यास लिखने की नहीं है, बल्कि दफ्तरों में छोटी-छोटी बातों को लेकर होने वाली राजनीति और पाखंड की है। अक्सर देखा गया है—हाँ, अपने देश के सरकारी दफ्तरों में भी—छोटे कर्मचारियों पर छोटी-छोटी बातों में ऊँगली उठाना आसान है, पर खुद की गलतियों या बड़ी लापरवाहियों पर कोई बोलता नहीं।
एक पाठक ने बढ़िया लिखा—"अगर कंपनी को वाकई नियम बनाने हैं, तो सब पर लागू करो; वरना ऐसी छोटी-छोटी बातों पर अड़ना सिर्फ छोटी सोच दिखाता है।"
निष्कर्ष: क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया?
आखिर में, ये कहानी सिखाती है—कभी-कभी दफ्तर की राजनीति में समझदारी से जवाब देना ही सबसे बड़ा हथियार होता है। छोटे मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने वालों को खुद उनकी चाल में उलझा दो!
क्या आपके साथ कभी ऐसा कुछ हुआ है? क्या आपके ऑफिस में भी कभी बिजली, चाय, स्टेशनरी या इंटरनेट के इस्तेमाल पर बवाल हुआ है? नीचे कमेंट में अपना किस्सा ज़रूर शेयर करें—क्योंकि हर दफ्तर में एक 'खुराफाती' तो होता ही है!
मूल रेडिट पोस्ट: Accused of stealing/embezzling electricity from employer