ऑफिस के फ्रिज में खाना चोरी? बदला ऐसा लिया कि सब दंग रह गए!
दोस्तों, ऑफिस की जिंदगी में छोटी-मोटी तकरारें तो आम हैं, लेकिन कभी-कभी कोई सहकर्मी हद ही पार कर देता है। सोचिए, आप बड़ी मेहनत से घर का खाना बनाते हैं, ऑफिस ले जाते हैं, और वहां कोई चुपके से आपका लंच उड़ाकर मज़े से खा जाता है...! ऐसे में गुस्सा तो आना लाज़मी है, लेकिन कभी-कभी गुस्से से भी मज़ेदार जवाब निकलता है। आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रही हूँ, जिसमें बदला लेने का अंदाज़ इतना अनोखा और मज़ेदार है कि पढ़कर आप भी कहेंगे – "वाह, क्या दिमाग लगाया है!"
ऑफिस का फ्रिज – खाने की जंग का मैदान!
ऑफिस का फ्रिज वैसे तो सबके खाने-पीने की चीज़ों के लिए होता है, लेकिन कुछ 'शरारती आत्माएँ' इसे अपनी जागीर समझ बैठती हैं। हमारी कहानी की नायिका के साथ भी यही हुआ। लगभग दस साल पहले, हर हफ्ते दो-तीन बार उनका घर का बना टिफिन फ्रिज से गायब हो जाता था। डिब्बा वहीं मिलता, लेकिन खाली या अधूरी हालत में। बाकी साथियों से पूछताछ में पता चला कि यह कारनामा एक ऐसे 'महानुभाव' का है, जो महिलाओं के प्रति पहले से ही दुर्भावना रखते थे। शिकायत करने पर भी मैनेजमेंट कान में तेल डाले बैठा था।
बदला लेने का देसी और दिमागदार तरीका
अब आप सोच सकते हैं – कोई आम इंसान होता तो शायद डिब्बे में नोट चिपका देता, या सीधे-सीधे बहस कर लेता। लेकिन यहाँ मामला था 'छोटी बदली' यानी पेटी रिवेंज का! हमारी नायिका ने ठान लिया कि इस बार चोर को ऐसी डरावनी सीख दी जाएगी कि फिर कभी किसी का लंच छूने की हिम्मत न हो।
उन्होंने दो हफ्ते तक फ्रीज में नकली टिफिन रखना शुरू कर दिया और खुद साधारण सैंडविच खा लिया, जो फ्रिज में रखने की जरूरत नहीं थी। इसके बाद ऑफिस में चुपचाप चर्चा छेड़ दी कि वे अब एक नया 'वेलनेस' तरीका अपना रही हैं – अपने मासिक धर्म का रक्त इकट्ठा कर खाने में मिलाना! उन्होंने बाकायदा मोबाइल पर एक वीडियो भी दिखा दिया जिसमें वे टिफिन बना रही हैं और 'मेनस्ट्रुअल कप' का सारा सामान उसमें मिलाती दिखती हैं (सिर्फ दिखाने के लिए, असल में कुछ भी ऐसा नहीं था)।
मनोवैज्ञानिक झटका – चोर की हालत पतली!
अब सोचिए, हिंदी ऑफिसों में अगर कोई ऐसी बात कह दे तो लोग मुँह बनाकर दूर भागने लगेंगे। यहाँ भी वही हुआ – चोर महोदय एक हफ्ते की छुट्टी पर चले गए! ऑफिस का फ्रिज अचानक सबके लिए सुरक्षित हो गया। बाकी सहकर्मियों को बाद में नायिका ने सच्चाई बता दी, लेकिन एक कमेंट में किसी ने सही लिखा – "कभी-कभी अपनी छवि की परवाह किए बिना सही सबक देना जरूरी होता है।"
एक यूज़र ने इस बदले को 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' बताया, तो किसी ने इसे 'खाने के पीरियड' का नया मतलब दे दिया! किसी ने तो मज़ाक में लिखा – "ये तो फ्रिज में महाभारत हो गई भाई!" और एक महिला ने कमेंट किया, "ऐसा नहीं है कि मुझे अपनी ये छवि बनने पर अफसोस होगा, जब तक बेवकूफ लोग मुझसे दूर रहें।" क्या बात है!
जब दिमाग से खेलो, तो जीत पक्की!
इस कहानी से एक बात तो साफ है – कभी-कभी सीधी टक्कर से बेहतर रणनीति होती है मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना। चोर महोदय को ऐसा 'नोसीबो इफेक्ट' (नेगेटिव प्लेसीबो) दिया कि बिना असली नुकसान के ही उनकी हालत खराब हो गई। वैसे, हमारे यहाँ भी लोग खाने में 'झूठ बोलकर' चोर को डराने के किस्से सुना चुके हैं – जैसे कोई दवाई मिला दी, या 'यह मेरा प्रसाद है' कह दिया, जिससे चोर डर के मारे दूर ही रहता है।
किसी ने कमेंट किया – "मेरी दादी के बॉस हमेशा सबका मीठा चुरा लेते थे। एक दिन दादी ने एक्स-लैक्स (दस्त की दवा) वाला चॉकलेट रख दिया। उसके बाद बॉस टॉयलेट से बाहर नहीं निकले और फिर कभी किसी का खाना नहीं छुआ!" हालाँकि, ध्यान रहे – ऐसी दवाइयाँ मिलाना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है, इसलिए मज़े-मज़े में ऐसा न करें।
क्या आप भी कभी ऐसी स्थिति में फँसे हैं?
तो दोस्तों, इस कहानी में जितनी चतुराई है, उतना ही हास्य भी। कभी-कभी जीवन की परेशानियों का हल सीधा नहीं, बल्कि थोड़ा सा 'तिलिस्मी' और मज़ेदार होना चाहिए।
आखिर में यही कहूँगी – अगर आप भी ऑफिस या हॉस्टल में खाने की चोरी झेल रहे हैं, तो कभी-कभी 'आउट-ऑफ-द-बॉक्स' सोचना पड़ता है। लेकिन याद रखिए, किसी को नुकसान पहुँचाए बिना, सिर्फ मनोवैज्ञानिक झटका देना ही असली जीत है!
आपकी क्या राय है? क्या आपके साथ भी कभी ऐसा कुछ हुआ है? नीचे कमेंट में अपने अनुभव ज़रूर साझा करें – शायद अगली कहानी आपकी हो!
मूल रेडिट पोस्ट: You want to steal my lunch ? Eat my period