ऑफिस की पार्किंग ड्रामे में 'वर्किंग वॉक' ने सबका खेल बिगाड़ा!
भैया, ऑफिस की दुनिया भी किसी टीवी सीरियल से कम नहीं होती! कभी बॉस के नखरे, तो कभी नियमों के झमेले – और ऊपर से अगर पार्किंग का झगड़ा भी जुड़ जाए, तो समझो मामला मसालेदार हो गया। आज हम आपको एक ऐसी ही मजेदार कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें पार्किंग कार्ड की कमी ने ऑफिस के माहौल में हलचल मचा दी, और एक होशियार कर्मचारी ने अपने कॉन्ट्रैक्ट का ऐसा फायदा उठाया कि बॉस भी चौंक गए।
जब पार्किंग बने सिरदर्द: “चलो थोड़ा टहल लो!”
सोचिए, आप नए ऑफिस बिल्डिंग में शिफ्ट हुए हैं। सफर थोड़ा लंबा हो गया, लेकिन चलो, बर्दाश्त कर लिया। अब परेशानी ये कि पार्किंग कार्ड सबको नहीं मिले, क्योंकि ‘कार्ड लिमिटेड हैं’। अपने भारतीय कल्चर में अक्सर ऐसा होता है – “भैया, गाड़ी तो पार्किंग में घुस जाएगी ना?” लेकिन यहाँ कहानी जर्मनी की है, जहाँ नियम-कायदे बड़े कड़े होते हैं।
हमारे कहानी के हीरो (चलो, उन्हें ‘कर्मचारी जी’ कहें) हफ्ते में दो दिन ऑफिस आते हैं। बॉस बोले, “फ्रंट डेस्क से कार्ड ले लेना, जगह तो होना ही चाहिए, सब लोग वर्क-फ्रॉम-होम कर रहे हैं।” लेकिन जैसे ही कर्मचारी जी फ्रंट डेस्क पहुँचे, साहिबा ने दो टूक कह दिया – “ये संभव नहीं है, कार्ड पर्सनल हैं, स्पॉट नहीं।”
अब सड़कों पर पार्किंग का भारत वाला जुगाड़ यहाँ नहीं चलता, और शहर के बीच में सड़क पर पार्किंग खोजना मतलब, गोविंदा की फिल्म का गाना – “अरे देखो, देखो, देखो, एक जगह खाली है…अरे निकल गई!” कर्मचारी जी ने बॉस को कॉल किया, बॉस ने ऊपर वाले बॉस को भेजा, और वहाँ से मिला जवाब – “पुराने ऑफिस की पार्किंग में लगाओ, २० मिनट पैदल चलना पड़ेगा, थोड़ा टहलना अच्छा है!”
कॉन्ट्रैक्ट का जादू: “वर्किंग आवर में वॉक!”
अब भारतीय कर्मचारी होते तो शायद ‘जुगाड़’ लगाते, या गाड़ी कहीं भी ठोक देते। लेकिन कर्मचारी जी ने सीधे वर्क काउंसिल से बात की – और वहाँ से सलाह मिली, “अपने कॉन्ट्रैक्ट को ध्यान से पढ़ो।”
मालूम चला – कॉन्ट्रैक्ट में ऑफिस का पुराना पता ही लिखा है! मतलब, ऑफिस पहुँचते ही काम शुरू, और ऑफिस से निकलते ही काम खत्म। तो फिर क्या, कर्मचारी जी ने पुरानी पार्किंग में गाड़ी लगाई, और रोज़ ऑफिस तक २० मिनट पैदल चले – लेकिन उस वॉक को “वर्किंग आवर” में गिनाया! कुल मिलाकर रोज़ ४० मिनट की एक्स्ट्रा सैलरी, और बॉस के मुँह में जैसे नींबू-नमक पड़ गया।
यहाँ एक कमेंट करने वाले ने बड़े मज़ेदार अंदाज़ में लिखा, “भैया, टाइम शीट में तो वॉक को बिजनेस ट्रिप दिखा दिया, अब तो खाने-पीने का भत्ता भी मांग लो!” जर्मनी जैसे देशों में नियम इतने सख्त हैं कि कर्मचारियों को firing करना इतना आसान नहीं, और इसी का फायदा कर्मचारी जी ने उठा लिया।
कम्युनिटी की चटपट बातें: “भारत में होते तो…!”
रेडिट पर कई लोगों ने अपनी-अपनी कहानियाँ साझा कीं। एक साहब बोले – “हमारे यहाँ तो पार्किंग ही खुद की जिम्मेदारी थी, और एक बार लैपटॉप से भरी ट्रॉली चोरी हो गई!” अमेरिका और यूरोप के काम करने के तरीके में जमीन-आसमान का फर्क है – वहाँ कर्मचारियों के पास अपने हक़ के लिए लड़ने के तरीके होते हैं, और firing इतनी आसान नहीं।
एक और कमेंट में लिखा गया, “ये कहानी पढ़कर तो साफ पता चल रहा है कि ये जर्मनी है – कॉन्ट्रैक्ट, वर्क काउंसिल, पार्किंग का झमेला…!” दूसरे ने हंसी में जोड़ा, “अगर नीदरलैंड्स होते, तो बंदा बाइक से चला जाता, पैदल क्यों चलता!”
किसी ने भारत की तुलना करते हुए लिखा, “यहाँ तो बॉस का मूड बिगड़ा, तो एक फोन पर नौकरी गई। अमेरिका में तो ‘at-will’ का फंडा है – कभी भी निकाल सकते हैं। लेकिन जर्मनी में कर्मचारी के पास पूरा खेल है!”
अंत भला तो सब भला: बॉस की विदाई और पार्किंग की जीत
दो हफ्ते तक कर्मचारी जी ने ‘वर्किंग वॉक’ का पूरा मजा लिया। आखिरकार, सबसे बड़े बॉस की तरफ से ईमेल आया – “अब से सबको दिन के हिसाब से पार्किंग पास मिलेगा, और सबको नए ऑफिस में ही पार्क करना है।”
इतना ही नहीं, फ्रंट डेस्क वाली मैडम को भी दूसरी जगह भेज दिया गया – शायद, ये भी ‘वर्किंग वॉक’ का असर था! और तो और, कर्मचारी जी की टाइमशीट को चार बार रिवाइज किया गया, और हर बार उनका वॉक ‘बिजनेस ट्रिप’ में दिखा।
कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब बॉस-बॉस, जो आठ महीने बाद रिटायर होने वाले थे, उन्हें गोल्डन हैंडशेक देकर समय से पहले ही रिटायर कर दिया गया। एक कमेंट में किसी ने मज़ाक में लिखा – “बॉस को तो खाने-पीने का भत्ता भी देना चाहिए था, इतनी वॉकिंग के बाद!“
पाठकों के लिए सवाल: क्या आप भी कभी ऐसे ऑफिस ड्रामे का हिस्सा बने हैं?
तो दोस्तों, इस कहानी से क्या सीखा? जहाँ नियम सख्त हैं, वहाँ समझदारी और कॉन्ट्रैक्ट का सही इस्तेमाल आपको सुपर हीरो बना सकता है! भारत में तो कभी-कभी काम से ज्यादा जुगाड़ चलता है, लेकिन जर्मनी जैसे देशों में नियमों की चालाकी भी एक कला है।
आपका क्या अनुभव रहा है ऑफिस की राजनीति, पार्किंग झंझट या ‘वर्किंग वॉक’ जैसी किसी चालाकी में? कमेंट में जरूर बताइए! और अगर आपके पास भी कोई ऐसी मसालेदार कहानी है, तो शेयर करना न भूलें।
साथ ही, अगली बार जब ऑफिस में कोई नया नियम लागू हो, तो आप भी अपना कॉन्ट्रैक्ट ध्यान से पढ़ लेना – क्या पता, सुपरहीरो बनने की बारी आपकी हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Just a nice little walk... Sure, Love it