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ऑफिस की टेलीफोन सिस्टम में बदलाव – जब ‘ऐसा ही चलता आया है’ पर लगी ब्रेक!

एक पुरानी TDM PBX फोन प्रणाली की कार्टून-3D चित्रण, जीवंत आईटी दुकान के माहौल में।
90 के दशक की यादों में खो जाइए इस रंगीन कार्टून-3D चित्रण के साथ, जो एक क्लासिक TDM PBX फोन प्रणाली को दर्शाता है। यह चित्रण उस समय की कहानी सुनाता है जब तकनीक तेजी से विकसित हो रही थी, और आईटी दुकान में फोन सिस्टम को संभालने का जादू बखूबी दिखाता है।

क्या आपने कभी अपने ऑफिस में सुना है – “भाई, सिस्टम को हाथ मत लगाना, बॉस को पसंद है!”? अगर हां, तो आज की ये कहानी आपके दिल को छू जाएगी। क्योंकि ऐसा ही कुछ हुआ था अमेरिका के क्लीवलैंड के एक छोटे से आईटी ऑफिस में, 90 के दशक में। लेकिन यकीन मानिए, ये कहानी सिर्फ टेलीफोन तारों की नहीं, बल्कि सोच की भी है – और हमारे यहां भी तो अकसर ‘ऐसा ही तो चलता आया है’ कहकर करोड़ों रुपये का नुकसान होता है!

पुरानी सोच और लाखों का नुकसान

कहानी के हीरो हैं एक आईटी मैनेजर (लेखक खुद), जिनका काम ऑफिस की टेलीफोन व्यवस्था भी देखना था। सोचिए, 1990 के दशक में, जब मोबाइल और इंटरनेट आम नहीं थे, कंपनियाँ अपने दफ्तर और प्लांट्स में बात करने के लिए भारी-भरकम टेलीफोन सिस्टम लगवाती थीं।

इनके ऑफिस में भी ऐसा ही एक पुराना PBX सिस्टम था – जिसके लिए हर महीने चार ‘ऑफ-प्रिमाइज़ एक्सटेंशन’ (OPX) लाइनों पर करीब 4 हजार डॉलर (आज के हिसाब से लाखों रुपये) खर्च हो रहे थे। वजह? कंपनी का हेड ऑफिस और कुछ कर्मचारियों के घर अलग इलाके में थे, जिससे अंदरूनी कॉल्स भी लॉन्ग डिस्टेंस मानी जाती थीं। इसलिए बॉस की पत्नी जब अपने पति को ऑफिस में फोन करतीं, तो लंबी दूरी का खर्च आता।

तो ‘समाधान’ ये निकाला गया कि हर महीने मोटी रकम देकर चार अलग-अलग लाइनें ले ली जाएं – ताकि सबकी बीवीयां, दोस्त और रिश्तेदार बिना अतिरिक्त खर्च के बात कर सकें।

"बिल्कुल मत छेड़ना, बॉस को पसंद है!"

अब सोचिए, हमारे यहां जैसे किसी चीज़ को छूना मना होता है क्योंकि ‘बड़े साहब’ को पसंद है, वहीं हाल यहां भी था। हमारे आईटी मैनेजर को साफ हिदायत मिली – “OPX लाइनों को छूना नहीं है, बॉस को बहुत पसंद है, उनकी बीवी को भी!”

जैसे हमारे दफ्तरों में कोई पुराना अलमारी या फाइलिंग सिस्टम होता है, जिसे कोई नहीं बदलता क्योंकि किसी सीनियर को पसंद है, वैसे ही यहां ये टेलीफोन लाइने बन गई थीं ‘अछूत’।

मैनेजर ने जब-जब लागत घटाने या नई सुविधा जोड़ने की बात की – हर बार जवाब यही मिला: “बिल्कुल मत छेड़ना, बॉस को पसंद है!”

जुगाड़ की तलाश – और एक आसान हल

लेकिन, जैसा कि हिंदी फिल्मों में होता है, हमारे हीरो ने हार नहीं मानी। उन्होंने टेलीफोन कंसल्टेंट से बात की, तो उसने झट से कहा – “तो बॉस की बीवी को मुफ्त में फोन करना है ना? एक टोल-फ्री 800 नंबर क्यों नहीं ले लेते?”

सोचिए, 4 हज़ार डॉलर के खर्च के बदले सिर्फ 100 डॉलर में काम! और वो भी उसी नई T1 लाइन के ज़रिए जिसका खर्च कंपनी पहले ही उठा रही थी।

लेकिन दिक्कत फिर वही – हर अफसर, हर सीनियर, हर बॉस यही बोले – “बिल्कुल मत छेड़ना, बॉस को पसंद है!”

असली बॉस की समझदारी – और कंपनी की बचत

आखिरकार, हमारे मैनेजर सीधे बॉस रॉय के पास पहुंचे, और पूरी बात समझाई – “देखिए, कॉल्स मुफ्त रहेंगी, सुविधा भी वही मिलेगी, लेकिन कंपनी हर महीने 3 हज़ार डॉलर बचा लेगी।”

रॉय साहब (जिन्होंने कंपनी खड़ी की थी) ने तुरंत कहा – “अरे, ये तो कोई दिमाग लगाने वाली बात ही नहीं! करना है तो कर दो, बाकी सबको बाद में बता देना।”

यहां एक कमेंटेटर ने लिखा – “कितनी बार सिर्फ इस डर से कुछ नहीं बदलते क्योंकि कोई बॉस को समझाने की हिम्मत नहीं करता!” और सच पूछिए तो हमारे यहां भी यही होता है – कोई पुरानी प्रक्रिया सिर्फ इसलिए चलती रहती है क्योंकि ‘हमेशा से ऐसा ही होता आया है’।

एक और पाठक ने शानदार बात कही – “अगर आपकी दलील सिर्फ ये है कि ‘ऐसा ही होता है’, तो असल में आपके पास कोई दलील नहीं है!”

सीख – बदलाव से ही तरक्की है

इस मज़ेदार कहानी से हमें क्या सीख मिलती है? वही जो हमारे दादाजी भी कहते थे – “समय के साथ बदलो, नहीं तो समय तुम्हें बदल देगा!”

कंपनियों में, सरकारी दफ्तरों में, या घर में – हर जगह, ‘ऐसा ही चलता आया है’ वाली सोच से न सिर्फ पैसे का, बल्कि समय और संसाधनों का भी बड़ा नुकसान होता है।

इसलिए, जब भी कोई नई तकनीक, नई सोच या नया जुगाड़ दिखे, सोचिए – क्या इससे हमारी जिंदगी या काम आसान हो सकता है? अगर जवाब हां है, तो ‘बॉस को पसंद है’ वाली सोच छोड़िए, और आगे बढ़िए!

आपकी राय?

दोस्तों, आपके ऑफिस में भी क्या कोई ऐसी पुरानी व्यवस्था है, जिसे कोई बदलना नहीं चाहता? या कोई मजेदार किस्सा हो, जब आपने जुगाड़ लगाकर सबका फायदा करवा दिया हो? कमेंट में जरूर बताइए!

और हां, अगली बार जब कोई बोले – “ऐसा ही चलता आया है”, तो ये कहानी जरूर सुनाइएगा!


मूल रेडिट पोस्ट: Doing 'something' to the phone system