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ऑफिस की चुगलीबाज के साथ छोटी पर मज़ेदार बदला-गाथा!

व्यस्त कार्यालय में जागरूक और सतर्क कार्यालय कर्मचारी की एनिमे-शैली की चित्रण।
इस जीवंत एनिमे-प्रेरित दृश्य में, हमारा कार्यालय चूहा कामकाजी हलचल के बीच पूरी तरह से जागरूक है, लंबे कार्य शिफ्ट्स की खुशियों और चुनौतियों पर विचार करते हुए। यह एक मजेदार याद दिलाता है कि व्यस्ततम कार्यालयों में भी हंसी और मित्रता के लिए हमेशा जगह होती है!

ऑफिस में काम करने वाले हर इंसान को कभी न कभी ऐसे साथियों से दो-चार होना ही पड़ता है, जिनकी आदतें न तो सुधरती हैं और न ही उनकी चुगलीबाज़ी कम होती है। सोचिए, अगर आपकी रात की शिफ्ट हो, बाहर कनाडा जैसी जगह में भयंकर सर्दी हो और ऊपर से एक ऐसी सहकर्मी हो जो हर बात GM तक पहुंचा दे? आज की कहानी में एक ऐसी ही ऑफिस चुगलीबाज को मिला करारा जवाब, वो भी बिल्कुल देसी अंदाज़ में!

जब ऑफिस की नींद पर पहरा हो

भारत में अक्सर लोग कहते हैं – “काम का बोझ हो तो नींद कहाँ?” लेकिन लम्बी शिफ्टों में थोड़ी देर झपकी लेना कोई अनहोनी बात नहीं। इस कहानी के नायक की ड्यूटी 12-12 घंटे, चार-चार दिन तक चलती थी। उनका साथ देती थीं उनकी एक दोस्त, जिनके साथ काम करना वैसे तो मज़ेदार था, लेकिन हफ्ते में दो बार उनकी शिफ्ट में आ जाती थीं एक “दुखियारी” सीनियर – जिसे यहाँ हम ‘चुगलीबाज दीदी’ कह सकते हैं।

वैसे तो सब चलता रहता, लेकिन चुगलीबाज दीदी के आने पर ऑफिस का माहौल “कर्फ्यू” जैसा हो जाता। न हँसी, न मज़ाक, न एक पल की राहत। एक बार तो उन्होंने एक बेहद शर्मनाक बात कही – “मैंने एक मुस्लिम सहकर्मी को धोखे में पोर्क वाला पिज़्ज़ा खिला दिया।” जब हमारे नायक ने टोक दिया कि यह तो बेहद गलत बात है, तो उन्होंने बड़ी बेशर्मी से अपनी ‘चतुराई’ की कहानी सुनाई।

चुगलीबाज की चुगली का जवाब

अब बात आई असली बदला लेने की! एक रात नायक थक कर 20 मिनट के लिए सो गए। तभी फोन की घंटी ने जगा दिया, और देखा कि चुगलीबाज दीदी घूर रही हैं। मामला GM तक पहुँच गया, लेकिन GM बड़े दिलवाले निकले – “काम सही चले तो मुझे फर्क नहीं पड़ता, नींद तो सबको आती है।” हमारे नायक ने मौके पर हँसी में टाल दिया।

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती! अगली रात भयंकर ठंड थी और वही चुगलीबाज दीदी अब खुद नींद में खर्राटे मार रही थीं। बस फिर क्या – नायक ने मोबाइल निकाला और प्राइवेट नंबर से बार-बार ऑफिस की घंटी बजा दी। ज्यों ही दीदी झपकी लगातीं, फोन बज उठता! पूरी रात दीदी की नींद हराम कर दी। अब बेचारा चुगलीबाज समझ गया, “जैसी करनी वैसी भरनी!” उसके बाद से दीदी ने कभी नायक या उनकी दोस्त की चुगली GM से नहीं की।

ऑफिस राजनीति: पीढ़ियों की जंग या इंसानियत की कमी?

इस कहानी पर Reddit पर भी खूब चर्चा हुई। किसी ने कहा, “चुगलीबाज की उम्र चाहे जो हो, ऐसा बर्ताव किसी भी उम्र में खराब ही लगता है।” एक और यूज़र ने चुटकी ली – “बूढ़े चुगलखोर कभी नहीं सुधरते!” कुछ ने तो यह भी साफ किया कि 55 साल की उम्र में कोई ‘बूमर’ (पश्चिमी पीढ़ी का वर्गीकरण) नहीं होता – असली मुद्दा ये नहीं, असली मुद्दा है इंसानियत और बर्ताव।

एक कमेंट में मुस्लिम धर्म के संदर्भ में यह भी बताया गया: “अगर कोई अनजाने में पोर्क खा ले, तो इस्लाम में उसे पाप नहीं माना जाता, असली बात तो नीयत की है।” यानी चुगलीबाज दीदी की नीयत ही खराब थी, और यही सबसे बड़ा अपराध है। एक और कमेंट में तो किसी ने अपने अनुभव सुनाए कि कैसे खुद कभी गलती से मुस्लिम दोस्त को पोर्क खिला दी थी, लेकिन दोस्त ने दिल बड़ा दिखाया।

“चोरी पकड़ी जाए तो चुप रहना ही बेहतर!”

हमारे यहाँ कहावत है – “जैसा करोगे, वैसा भरोगे।” ऑफिस की राजनीति में भी यही होता है। चुगली, बुराई और छोटी सोच रखने वाले लोग आखिरकार खुद अपने जाल में फँस जाते हैं। Reddit के एक मजेदार कमेंट के अनुसार, “कुछ लोग इतने कड़वे होते हैं कि खुद ही अपनी जीभ काट लेते हैं।” ऑफिस में चाहे कोई भी हो – उम्र, जात, धर्म या जेंडर – अच्छा या बुरा बर्ताव हर जगह पहचाना जाता है।

इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि ऑफिस में दोस्ती, समझदारी और दयालुता सबसे बड़ी पूँजी हैं। और जो लोग दूसरों की टांग खींचने में लगे रहते हैं, उन्हें एक दिन खुद ही अपनी हरकतों का फल मिल जाता है – कभी प्राइवेट नंबर की घंटी बनकर, तो कभी GM की उदारता के रूप में!

निष्कर्ष: आपकी ऑफिस चुगलीबाज कौन है?

तो दोस्तों, क्या आपके ऑफिस में भी ऐसी कोई चुगलीबाज दीदी/भैया हैं? या कभी किसी ने आपकी झपकी पर पहरा बिठाने की कोशिश की है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए! और अगर आपके पास भी ऐसी कोई मज़ेदार बदले की कहानी हो, तो उसे हमसे साझा करना न भूलें। आखिरकार, “अच्छे कर्म का फल अच्छा, और बुरे का बदला ऑफिस की घंटी है!”


मूल रेडिट पोस्ट: An office rat isn’t sleeping either!!!