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ऑफिस का 'इंटरनल वाईफाई' जुगाड़: जब ट्रेनर बन गया टेक्नोलॉजी का खिलाड़ी

धीमी आंतरिक वाईफाई समस्याओं का सामना कर रहे एक तनावग्रस्त ऑफिस कर्मचारी की एनीमे चित्रण।
इस जीवंत एनीमे दृश्य में, एक कर्मचारी अपने लैपटॉप के साथ नेटवर्क कनेक्शन की परेशानियों से जूझते हुए नजर आ रहा है। यह आधुनिक कार्यालय में आंतरिक वाईफाई चुनौतियों की frustrations को दर्शाता है।

ऑफिस में टेक्नोलॉजी से जुड़ी परेशानियाँ तो आम हैं, लेकिन जब वही इंसान जो दूसरों को ट्रेनिंग देता है, खुद ही गड़बड़झाला कर बैठे, तो मामला दिलचस्प हो जाता है। आज हम आपको एक ऐसी ही कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें एक सुपरवाइजर लेवल के ट्रेनर ने अपने ऑफिस नेटवर्क को ऐसा उलझाया कि खुद भी फंस गए और आईटी टीम के बाल भी खड़े कर दिए।

जुगाड़ का जाल: वाईफाई, VPN और स्पीड का खेल

कहानी कुछ यूं है कि ऑफिस के एक सुपरवाइजर, जिनका काम ही बाकी कर्मचारियों को ट्रेनिंग देना है, ने अपनी लैपटॉप को डॉक्स से जोड़ रखा था। आमतौर पर, डॉक्स में नेटवर्क केबल लगाई जाती है जिससे इंटरनेट सीधा और तेज चलता है। लेकिन हमारे जुगाड़ू ट्रेनर ने न जाने किस सोच में, डॉक्स से केबल निकाल दी, जबकि केबल और नेटवर्क पोर्ट दोनों बिल्कुल दुरुस्त थे।

अब हुआ ये कि वे हर रोज ऑफिस आते ही इंटरनल वाईफाई से खुद को मैन्युअली डिस्कनेक्ट करते, फिर पब्लिक वाईफाई से जुड़ जाते। इसके बाद सुरक्षा के लिए VPN से कनेक्ट होकर, ऑफिस के इंटरनल नेटवर्क में घुसते। यानी, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना — तेज नेटवर्क छोड़कर स्लो पब्लिक वाईफाई और ऊपर से VPN की लेयर! इससे उनकी नेटवर्क स्पीड 80% तक धीमी हो गई।

आप सोच रहे होंगे, ये तो वही बात हो गई – "आम के आम, गुठलियों के दाम!" मतलब, सुविधा की जगह खुद ही कठिनाई चुनना।

टिप्‍पणियाँ और तड़का: जब टेक कम्युनिटी ने लगाई क्लास

रेडिट पर इस किस्से को सुनकर लोगों ने खूब मजा लिया। एक यूज़र ने लिखा, "भाई, ये तो रोज़-रोज़ का सिरदर्द है, कभी-कभी तो हत्या करने का मन करता है!" (जाहिर है, मजाक में)। किसी ने तो VPN के जरिए यूएस से यूके के सर्वर तक पहुंचने को सलामत दिमाग का कमाल कहा, जैसे अपने दिल्ली से पटना जाने के लिए पहले दुबई होते हुए जाएं!

एक और कमेंट था, "यूज़र को ट्रेनिंग देने वाले में से यूज़र को निकाल पाना अब तक नामुमकिन है।" यह बात तो हर ऑफिस वाले समझ सकते हैं — ट्रेनर हो या ट्रेनी, आदतें जाती नहीं!

कई अनुभवी लोगों ने सलाह दी कि पब्लिक वाईफाई से VPN कनेक्शन ब्लॉक कर दो, लेकिन किसी ने चुटकी ली — "फिर लोग मोबाइल हॉटस्पॉट ऑन करके काम करेंगे, और टिकट बनाएंगे कि इंटरनेट नहीं चल रहा।" यानी, समस्या का सिर काटो तो पूंछ निकल आती है!

भारतीय ऑफिस कल्चर में ऐसी जुगाड़बाज़ी क्यों?

हमारे यहाँ ऑफिसों में जुगाड़ ही चलता है। कोई कंप्यूटर स्लो हो तो पहले रिबूट, फिर वाईफाई कनेक्शन बदलो, फिर भी न चले तो आईटी वाले को फोन घुमा दो। लेकिन कभी-कभी ये जुगाड़ खुद के लिए ही जाल बन जाता है।

कुछ लोग मानते हैं कि पब्लिक वाईफाई तेज है, क्योंकि वहां ज्यादा लोग नहीं जुड़े होते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि सिक्योरिटी और स्पीड, दोनों का मेल जरूरी है। ऊपर से VPN जोड़ दो, तो वही हाल हो जाता है जैसे ट्रैफिक में फंसी गाड़ी को ओवरटेक करवाने के लिए उल्टा रूट पकड़ लो — पहुंचेगे तो सही, लेकिन देर से और चिड़चिड़ाहट के साथ।

एक कमेंट में तो किसी ने कहा, "कुर्सी और कीबोर्ड के बीच का इंटरफेस ही असली दिक्कत है!" (सीधा-सीधा मतलब, दिक्कत बंदे में है, सिस्टम में नहीं)।

टेक्नोलॉजी के साथ समझदारी भी ज़रूरी

भारतीय ऑफिसों में अक्सर देखा जाता है कि लोग टेक्नोलॉजी के नाम पर सिर्फ 'जुगाड़' जानते हैं, असल में समझदारी से उसका इस्तेमाल नहीं करते। जैसे—लैपटॉप और डॉक्स, दोनों में पावर केबल लगा दी, ताकि बैटरी कभी न खत्म हो। ठीक है, लेकिन इंटरनेट के मामले में ऐसा जुगाड़ उल्टा पड़ सकता है।

रेडिट की चर्चा में एक टेक एक्सपर्ट ने समझाया, "डॉक और लैपटॉप, दोनों में पावर लगाने से नुकसान नहीं है, जब तक सब कुछ कम्पैटिबल है।" लेकिन इंटरनेट के मामले में तो सीधा फॉर्मूला है — जो सीधा, वही सही!

निष्कर्ष: जुगाड़ से बचो, टेक्नोलॉजी से दोस्ती करो!

आखिर में यही कहना है कि टेक्नोलॉजी में जुगाड़ कभी-कभी मजेदार किस्से तो बनाते हैं, लेकिन काम की रफ्तार और सुरक्षा पर भारी भी पड़ सकते हैं। अगर आप भी ऑफिस में ऐसे किसी जुगाड़ू कर्मचारी को जानते हों, तो उसे प्यार से समझाइए — "भैया, पब्लिक वाईफाई छोड़ो, इंटरनल नेटवर्क से जुड़ो, और आईटी टीम का सिरदर्द मत बनो!"

क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे जुगाड़ू किस्से होते हैं? कमेंट में जरूर बताइए — और हाँ, अगली बार जब वाईफाई धीमा लगे, तो जरा सोचिएगा, असली दिक्कत कहाँ है!


मूल रेडिट पोस्ट: internal wifi