ऑफिस का ‘इंजीनियर भाई’ – काम कम, बहाने ज्यादा!
हर ऑफिस में एक ऐसा बंदा जरूर होता है, जो हर काम में टालमटोल करता है और उसके बहानों की गिनती ही नहीं होती। कभी-कभी तो लगता है कि जैसे ये लोग ‘बहाना बनाने’ की पीएचडी करके आए हैं। आज की कहानी भी ऐसे ही एक ‘इंजीनियर भाई’ की है, जिसकी हरकतों ने उसके सुपरवाइज़र को परेशान कर रखा है। आइए जानते हैं, कैसे ऑफिस के ये ‘महारथी’ दिनभर काम से जी चुराते हैं और कैसे उनके सुपरवाइज़र की हालत पतली हो जाती है!
जब ‘हाँ’ बोले, समझो अभी काम बाकी है!
कहते हैं, भारत में जब कोई कर्मचारी "हाँ हो जाएगा" बोल दे, तो समझ लीजिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा। ठीक वैसा ही हाल है इस कहानी के इंजीनियर भाई का। जब भी सुपरवाइज़र साहब उनसे किसी गेस्ट के लिए कुछ करवाना चाहते हैं, जनाब फौरन ‘ठीक है’ बोल देते हैं। मगर असलियत में वो काम पूरा हुआ या नहीं, इसका जवाब मिलने में कई बार तो गेस्ट ही बता देते हैं – ‘अभी तो कोई आया ही नहीं!’
अब सोचिए, जब सुपरवाइज़र दोबारा फोन लगाते हैं, तो इंजीनियर भाई का नया ड्रामा शुरू – “अरे, मैं तो गया था!” और फिर, खुद ही फ्रंट डेस्क पर आकर ट्रांसलेटर (गूगल ट्रांसलेट जैसा ऐप) लेकर पूछते हैं – “अरे, उस कमरे को क्या चाहिए था?”
यह तो वही बात हो गई – ‘मुँह में रोटी, हाथ में मोबाइल, और दिमाग काम से कोसों दूर!’
काम से ज्यादा स्नैक्स – ये है असली टैलेंट!
हमारे दफ्तरों में एक और कॉमन चीज़ है – चाय-पकोड़े या स्नैक्स का मोह। लेकिन इस इंजीनियर भाई के तो क्या कहने! जब भी सुपरवाइज़र साहब फोन लगाते हैं, जनाब के मुँह में कुछ न कुछ जरूर होता है। लगता है, मानो ऑफिस का आधा समय यही खाते-पीते निकल जाता है। और ऊपर से लंच ब्रेक भी पूरे एक घंटे का!
यहां एक कमेंट करने वाले ने तो कमाल ही कह दिया – “लगता है, भाईसाहब का असली टैलेंट लंच ब्रेक बढ़ाने में है, काम में नहीं!”
ऑफिस की राजनीति – मैनेजमेंट की उलझन
अब सुपरवाइज़र साहब ने समझदारी दिखाई और इंजीनियर भाई की इन हरकतों की शिकायत हेड इंजीनियर और जीएम (जनरल मैनेजर) से भी कर दी। लेकिन, जैसा कि हमारे यहाँ अक्सर होता है – सब एक-दूसरे पर टालते रहे।
रेडिट पर एक कमेंट में किसी ने सलाह दी – “सारे काम लिखित में लो, हर रिक्वेस्ट और उसके पूरे होने का टाइम नोट करो, और साइन करवाओ। फिर देखो, कैसे बचकर निकलता है!”
एक और यूज़र ने कहा, “अगर सुधार नहीं होता, तो ऐसे लोगों को रिप्लेस करना ही बेहतर है। आजकल तो अच्छे कैंडिडेट्स की लाइन लगी है।”
यह बात भारतीय ऑफिसों में भी खूब फिट बैठती है – फाइल में लिखित शिकायत हो तो ‘मालिक’ भी सोच में पड़ जाते हैं!
बहानों का बादशाह – और क्या किया जाए?
कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि गेस्ट से ही रिक्वेस्ट करवाओ, और जब काम न हो तो गेस्ट मैनेजर से शिकायत करें। इससे या तो इंजीनियर भाई की क्लास लगेगी या गेस्ट को डिस्काउंट मिल जाएगा – दोनों में से कोई भी भारतीय दफ्तर में बहुत आम बात है!
एक और मज़ेदार कमेंट था – “लगता है, भाईसाहब इंजीनियर नहीं, मेंटेनेंस वाले हैं, लेकिन टाइटल बड़ा मिल गया है।” सच कहें तो, हमारे यहाँ भी कई बार ‘इंजीनियर’ का तमगा ऐसे-वैसे ही मिल जाता है!
निष्कर्ष – आपके ऑफिस में भी है क्या ऐसा इंजीनियर भाई?
बात सीधी है – हर ऑफिस में एक न एक ऐसा ‘इंजीनियर भाई’ जरूर होता है, जो काम कम और बहाने ज्यादा बनाता है। उसकी वजह से बाकियों का काम भी अटक जाता है और कभी-कभी तो मन करता है – “भैया, या तो सुधर जाओ या रास्ता नापो!”
अगर आप भी ऐसे किसी बंदे से परेशान हैं, तो ऊपर दिए गए टिप्स आज़मा सकते हैं – लिखित शिकायत, काम का रिकॉर्ड, गेस्ट की मदद, और जरूरत पड़े तो मैनेजमेंट तक बात पहुंचाइए। और हाँ, ऑफिस की राजनीति में धैर्य बहुत जरूरी है!
आपको क्या लगता है, ऐसे कर्मचारियों से कैसे निपटा जाए? आपके ऑफिस में भी कोई ऐसा ‘बहाना किंग’ है? कमेंट में जरूर बताएं – आपकी कहानी सुनने का हमें भी इंतजार रहेगा!
मूल रेडिट पोस्ट: Engineer man issues