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ऑटो पार्ट्स की दुनिया में ‘O’ और ‘0’ का झमेला: जब एक अक्षर ने मचा दिया बवाल

ऑटोमोटिव पार्ट नंबरों का कार्टून-3डी चित्र, ओईएम और आफ्टरमार्केट पार्ट्स के लिए तकनीकी सहायता संदर्भ में।
ऑटोमोटिव पार्ट नंबरों की दुनिया में कदम रखें! यह जीवंत कार्टून-3डी चित्र ओईएम और आफ्टरमार्केट पार्ट्स के बीच के अंतर को दर्शाता है, तथा ऑटोमोबाइल उद्योग में तकनीकी सहायता को सामना करने वाली चुनौतियों को उजागर करता है।

कभी सोचा है कि एक मामूली सा अक्षर या अंक किसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी की नाक में दम कर सकता है? ऑफिस की भागदौड़, चाय की चुस्कियों के बीच जब तकनीकी सपोर्ट वाले भाईसाहब को फोन आता है – “सर, पार्ट नंबर में गड़बड़ हो गई है!” – तो समझ लीजिए, असली तमाशा शुरू होने वाला है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां ‘O’ (अक्षर) और ‘0’ (शून्य) ने मिलकर पूरी कंपनी को संकट में डाल दिया।

जब एक छोटा सा फर्क बना सिरदर्द

अब जरा सोचिए – आपकी कंपनी कार के पार्ट्स बनाती है। वही पार्ट्स दो जगह जाते हैं: एक तरफ असली फैक्ट्री (OEM) और दूसरी तरफ डीलर की रिपेयर शॉप। दोनों के लिए पार्ट एक जैसा, बस ऑर्डर और डिलीवरी अलग-अलग। पर कहानी में ट्विस्ट है!

हर बार जब पार्ट्स की शिपमेंट निकलती, तो EDI नाम की एक तकनीकी व्यवस्था के ज़रिए ग्राहक को 30 मिनट के अंदर सूचना भेजनी होती। (EDI मतलब इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटरचेंज – जैसे हमारे यहां दुकानदार अपने हिसाब-किताब में एंट्री करते हैं, वैसे ही कंपनियां डिजिटल तरीके से ऑर्डर, इनवॉइस वगैरह भेजती हैं।) पुरानी कंप्यूटर मशीन और 56k डायलअप मॉडम – सोचिए, इंटरनेट तो छोड़िए, यहां तो फोन की लाइन पर ही सब कुछ टिका था! कहीं कोई अड़चन आई, तो टेक्निकल सपोर्ट वाले को तुंरत फोन।

‘O’ बनाम ‘0’: गड़बड़ी की असली वजह

एक दिन ग्राहक की शिकायत आई – “आप गलत डेटा भेज रहे हैं!” टेक्निकल सपोर्ट वाले भाई ने रिकॉर्ड चेक किए, सब सही लगा। लेकिन मामला सुलझा नहीं। आखिरकार, कंपनी के आईटी, प्रोडक्शन, शिपिंग और सेल्स वाले मिलकर डेट्रॉइट (अमेरिका की मोटर नगरी) पहुंचे।

45 मिनट तक डांट-फटकार, धमकी, और सवाल-जवाब के बाद असली बात सामने आई – “आप गलत पार्ट नंबर भेजते हैं!” लॉग निकालकर दिखाया, पार्ट नंबर एकदम मेल खाते हैं। पर ग्राहक बोला – “भाई, प्रोडक्शन पार्ट्स में 10075 है, रिपेयर पार्ट्स में 1oo75 है!” (अब ध्यान दें – एक में ‘0’ यानी शून्य, दूसरे में ‘O’ यानी अंग्रेज़ी का अक्षर O!)

जरा सोचिए, रात की शिफ्ट में बैठा शिपिंग क्लर्क, आंखें मलते हुए कम्प्यूटर में नंबर टाइप करता है; अब उसमें O और 0 का फर्क समझाना – जैसे किसी को ‘चाय’ और ‘छाछ’ में फर्क बताना।

कम्युनिटी की राय: ‘पार्ट नंबर’ का पिटारा

इस कहानी पर Reddit की जनता ने भी खूब मज़ेदार कमेंट्स किए। एक इंजीनियर साहब ने लिखा – “हमारे यहां पार्ट नंबर में O, 0, I, 1 सब मिला दिए जाते थे। इंजीनियर तो समझ लेते, पर जब ERP में डाला गया, तो गैर-तकनीकी लोग रोज गलती करते। आखिरकार, पार्ट नंबर की स्पेसिफिकेशन बदलवानी पड़ी, तब जाकर चैन मिला।”

एक और जनाब बोले – “20 साल पहले 50 मॉनिटर के सीरियल नंबर लिखने पड़े; 8/B, O/0, I/1/l सब एक जैसे लगते थे। सिरदर्द बन गया था!”

किसी ने तो यहां तक कहा – “मैंने आज तक ऐसा ऑटो पार्ट नहीं देखा जिसमें O आता हो, हमेशा 0 ही होता है।” इस पर ओरिजिनल पोस्टर ने चुटकी ली – “नाम नहीं लूंगा, लेकिन ये Ford वाली कंपनी का मामला था!”

एक और कमेंट पढ़िए – “कुछ कंपनियां तो पार्ट नंबर सिस्टम में इतनी उलझन डाल देती हैं कि सही पार्ट ऑर्डर करने के बाद भी गलत चीज़ मिल जाती है। जैसे HP के लैपटॉप स्क्रीन – पार्ट नंबर एक ही, पर स्क्रीन कभी ग्लॉसी, कभी मैट, केबल 30-पिन या 40-पिन – सब एक ही नंबर में!”

सिस्टम की कमजोर कड़ी और देसी अनुभव

अब असली मसला ये था कि सिस्टम में डेटा एक जगह से दूसरी जगह जाता, लेकिन तरीका पुराना – ऑर्डर आया, प्रिंट हुआ, फिर किसी दूसरे शहर के VAX सिस्टम में हाथ से डाला गया, फिर प्रिंट हुआ, फिर EDI में हाथ से एंट्री। यानी इंसान की गलती की पूरी गुंजाइश!

यहां एक पाठक ने देसी अंदाज में लिखा – “गलती वहीं होती है, जहां इंसान को हर स्टेप में घुसेड़ा जाए!”

आपने भी दफ्तरों में देखा होगा – जब तक सिस्टम ऑटोमैटिक नहीं बनता, तब तक चाय की प्याली से लेकर बॉस की डांट तक, सबका सामना करना पड़ता है।

सीख: एक छोटी भूल का बड़ा असर

इस पूरी घटना से एक बात तो साफ है – तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, इंसान की छोटी सी लापरवाही (या डिजाइनर की ‘क्रिएटिविटी’) पूरे सिस्टम को हिला सकती है। पार्ट नंबर में O और 0 का फर्क न समझ पाना, कंपनी को मीटिंग, डांट-फटकार और बदनामी तक ले गया।

ऑटोमोबाइल, बिजली, कंप्यूटर – हर जगह ये कहानी दोहराई जाती है। आखिरकार, सिस्टम को आसान और समझदार बनाना ही सबसे बड़ा हल है, चाहे फिर इंजीनियर साहब को अपनी आदतें बदलनी पड़ें या मैनेजर को नया नियम बनाना पड़े।

निष्कर्ष: आपकी राय क्या है?

तो भइया, आप भी कभी ऐसी गड़बड़ी का शिकार हुए हैं? क्या आपके ऑफिस में भी O और 0 ने हंगामा मचाया है? अपने अनुभव और मजेदार किस्से नीचे कमेंट में जरूर लिखिए। कौन जाने, अगली कहानी आपकी ही हो!


मूल रेडिट पोस्ट: Part numbers