एक पुलिसवाले की कहानी: जब कचरे की टोकरी को समझ लिया कपड़े धोने की टोकरी
होटल में काम करना वैसे तो रोज़मर्रा की आम बात है, लेकिन कभी-कभी ऐसे मेहमान आ जाते हैं कि उनसे जुड़ी घटनाएँ चाय की प्याली में तूफान ला देती हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही सच्ची घटना सुनाने जा रहे हैं, जिसमें एक पुलिसवाले ने अपनी समझदारी के झंडे गाड़ दिए और होटल वालों की शामत आ गई! सोचिए, अगर कोई अपने कपड़े कचरे की टोकरी में डाल दे और फिर पूछे – "भैया, मेरा लॉन्ड्री बास्केट कहाँ गया?" तो क्या होगा?
होटल में समझदारी की परीक्षा: कचरे की टोकरी या लॉन्ड्री बास्केट?
यह घटना अमेरिका के एक होटल की है, लेकिन ऐसी 'गजब की समझदारी' का नमूना तो भारत के छोटे-छोटे कस्बों में भी देखने को मिल जाता है। हुआ यूँ कि एक पुलिस अफसर होटल में कुछ दिनों के लिए ठहरने आए। एक दिन उन्होंने होटल के फ्रंट डेस्क पर फोन करके बड़े अधिकार से पूछा – "मेरे कपड़े कहाँ हैं? मैंने लॉन्ड्री बास्केट में रखे थे, अभी धोना नहीं था।"
फ्रंट डेस्क ने शांति से जवाब दिया – "कौन सा लॉन्ड्री बास्केट, सर?"
पुलिसवाले बोले – "अरे! वही छोटी सी टोकरी, जो कमरे में टेबल के पास रखी थी।"
फ्रंट डेस्क वाले भी मुस्कराते हुए बोले – "सर, वो लॉन्ड्री बास्केट नहीं, वो तो कचरे की टोकरी है। हम लॉन्ड्री बास्केट नहीं देते।"
अब यहाँ से तो बवाल होना ही था। पुलिसवाले महाशय गुस्से में लाल-पीले हो गए। उन्हें लगा कि कहीं हाउसकीपिंग वालों ने उनके कपड़े फेंक तो नहीं दिए? जब आगे छानबीन हुई तो पता चला कि हाउसकीपिंग ने तो दिनभर का सारा कचरा उठाकर कम्पैक्टर में डाल दिया है – यानी वो कपड़े अब कबाड़ की दुनिया में जा चुके थे!
अब पुलिसवाले महोदय होटल वालों से मुआवजे की मांग करने लगे – "मेरे कपड़ों का पैसा दो!"
इंटरनेट की पंचायत: जब सोशल मीडिया पर उड़ा मजाक
जैसे ही यह कहानी Reddit पर सामने आई, लोगों ने इस पर जमकर चुटकियाँ लीं। एक लोकप्रिय टिप्पणी थी –
"समझदार होना थकाऊ है, लेकिन मूर्ख होना महँगा।"
इसका जवाब किसी ने दे मारा – "मूर्खता खुद के लिए ही नहीं, सामने वाले के लिए भी थकाऊ है!"
एक और यूजर ने तंज कसा – "भाई, ऐसे लोगों को बंदूक और बैज मिल जाता है, ये तो डर की बात है।"
सोचिए, भारत में भी अगर कोई पुलिसवाला इतनी बेसिक चीज़ न समझ पाए, तो लोग कहेंगे – "अरे भैया, ऐसे लोग कानून का पालन कराएंगे?"
किसी ने तो मजाक में लिखा – "ऐसा लग रहा है, जैसे इस पुलिसवाले ने पहली बार होटल में कदम रखा हो, या शायद पहली बार धरती पर ही आया हो!"
एक और मजेदार कमेंट था – "पॉपकॉर्न को तिजोरी में रखकर सोच रहे होंगे – क्यों नहीं फूट रहे, और अब बाहर भी नहीं निकाल पा रहे!"
भारतीय नजरिए से: क्या सिखाती है यह घटना?
अब ज़रा सोचिए, अपने देश में घरों में कपड़े रखने के लिए अलग टोकरी होती है – और कचरे की टोकरी तो बचपन से ही हर किसी ने देखी है। मम्मी बार-बार टोकती हैं, "कपड़े यहाँ डालो, कचरा वहाँ डालो", लेकिन ये पुलिसवाले साहब तो शायद क्लास में पीठ करके बैठे होंगे!
यह घटना हमें ये भी सिखाती है कि किसी भी चीज़ को उसकी जगह पर रखना और साधारण समझदारी दिखाना कितना ज़रूरी है। कई बार दफ्तरों में भी लोग जरूरी फाइलें कचरे के ढेर पर रख देते हैं और फिर सफाई कर्मचारी उठा ले जाते हैं। एक कमेंट में किसी ने अपनी ऑफिस की कहानी सुनाई – "हमारी अकाउंटेंट ने सबके बिल और रसीदें कचरे की टोकरी के ऊपर रख दीं, और सफाई वाले उठा ले गए। फिर सबको सिर पकड़कर बैठना पड़ा!"
हँसी के साथ सीख: आम समझदारी सबसे बड़ी चीज़
इस घटना पर एक पाठक ने बिल्कुल सही लिखा – "अगर आप कचरे की टोकरी में कुछ रखते हो, तो आप खुद ही कह रहे हो कि इसे फेंक दो।"
कई बार छोटी-छोटी गलतियाँ हमारी जेब पर भारी पड़ जाती हैं। जैसे गाँव में कहावत है – "अकल बड़ी या भैंस?" यहाँ तो भैंस जीत गई!
और सबसे बड़ी बात, पुलिसवाले साहब अब मुआवजे के लिए होटल से झगड़ रहे हैं – "मेरे कपड़ों के पैसे दो!" होटल का क्या कसूर, भाई? कचरे की टोकरी में कपड़े डालोगे तो वो कबाड़ में ही मिलेंगे, धोबी के पास नहीं।
आपकी राय क्या है?
अब आप ही बताइए, ऐसी घटना आपके साथ होती तो आप क्या करते? क्या कभी आपने या आपके किसी दोस्त ने भी ऐसी कोई 'मूर्खता' की है? कमेंट में ज़रूर बताइए। और अगर ये किस्सा पसंद आया हो तो शेयर करना न भूलें – क्योंकि हँसी बाँटना भी तो एक कला है!
समाप्त!
मूल रेडिट पोस्ट: the basket