एक छोटी सी गलतफहमी, बड़ी सज़ा: होटल के काउंटर की दिलचस्प दास्तान
कभी-कभी ज़िंदगी में सबसे छोटी बातें ही सबसे बड़ी मुसीबत का कारण बन जाती हैं। खासकर जब आप होटल के रिसेप्शन पर काम कर रहे हों, जहां हर रोज़ नए-नए मेहमान आते हैं और उनकी उम्मीदें भी अलग-अलग होती हैं। आज हम आपको ऐसी ही एक कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें भाषा, भावनाएं और मैनेजमेंट की राजनीति ने मिलकर एक सीधी-सादी बात को तिल का ताड़ बना दिया।
भाषा की दीवार और होटल का रिसेप्शन: एक आम दर्द
देश बदलते ही भाषा और संस्कृति भी बदल जाती है। अब सोचिए, अगर कोई भारतीय परिवार अमेरिका के किसी होटल में जाए और टीवी पर देसी चैनल न मिले, तो कितनी निराशा होगी! बस, कुछ ऐसा ही हाल एक स्पैनिश-भाषी महिला का था, जो अपने परिवार के साथ होटल आई थी। उसने रिसेप्शनिस्ट (जो खुद भी स्पैनिश बोलते थे) से शिकायत की—"यहाँ स्पैनिश प्रोग्रामिंग क्यों नहीं है?" रिसेप्शनिस्ट ने पूरी सहानुभूति के साथ माफ़ी मांगी और हँसते-हँसते कह दिया, "यह अमेरिका है, यहाँ लोग अपनी ही दुनिया में रहते हैं।"
अब इसमें बुरा क्या था? मगर जनाब, मुँह से निकले शब्द कभी-कभी गलतफहमी का जादू भी चला सकते हैं। महिला को लगा, जैसे रिसेप्शनिस्ट कह रहे हों – "अब आप अमेरिका में हैं, तो अंग्रेज़ी सीखिए।" जबकि उसका पति कहता है, बातचीत तो अच्छी-खासी रही!
मैनेजमेंट की राजनीति: ‘ना खुदा ही मिला, ना विशाले सनम’
अब आते हैं असली मसले पर। जब मामला मैनेजमेंट तक पहुँचा, तो वहाँ भी वही चलता है जो अक्सर हमारे ऑफिसों में होता है – 'बड़े साहब का मूड और परफॉर्मेंस रिपोर्ट की राजनीति!' रिसेप्शनिस्ट को ‘वर्बिएज’ यानी बोलचाल की शैली को लेकर तीसरी बार नोटिस पकड़ा दिया गया। मज़ेदार बात ये कि दो घटनाओं के बारे में तो कभी बताया भी नहीं गया! खुद रिसेप्शनिस्ट ने कहा—"शायद ये सब सिर्फ़ इसीलिए है ताकि मुझे सैलरी बढ़ोतरी न मिले।"
एक कमेंट करने वाले ने तो चुटकी लेते हुए कहा—"लगता है तुम्हारे मैनेजर्स को बाईलिंगुअल लोग पसंद नहीं।" वहीं, दूसरे ने तो भारत के दफ्तरों जैसा माहौल याद दिला दिया—"सालाना मूल्यांकन के वक्त ही क्यों अचानक कम्युनिकेशन की कमी याद आती है?"
ग्राहक, भाषा और होटल: आखिर किसकी गलती?
अब जरा सोचिए, अगर आप राजस्थान के किसी होटल में जाएं और वहाँ कोई विदेशी आए, तो क्या हर भाषा की टीवी उपलब्ध होगी? बिल्कुल नहीं! एक पाठक ने तो खूब कहा—"यूरोप में तो अगर होटल में इंग्लिश न्यूज चैनल मिल जाए, वही गनीमत है। बाकी तो हर देश अपनी ही भाषा में शो दिखाता है।"
इसी तरह, एक और कमेंट में मज़ेदार किस्सा था—"एक बार बच्चे ने होटल के गलियारे में उल्टी कर दी, मैंने मस्ती में कहा—'ये तो ट्रेनिंग मैन्युअल में नहीं था, पर साफ कर दूँगा।' अगले दिन नेगेटिव रिव्यू आ गया—'स्टाफ ट्रेन नहीं था!'"
भाई, होटल के स्टाफ का काम हर वक्त मुंह पर ताला लगाकर रखना और ग्राहक की हर बात पर सिर झुकाकर 'जी हुज़ूर' कहना ही मान लिया गया है।
सीख क्या है? ‘भाषा के पुल बनाओ, दीवारें नहीं’
इस कहानी से हमें यही समझ आता है कि कभी-कभी अच्छा इरादा भी गलतफहमी में उलझ जाता है। ऑफिस की राजनीति, मैनेजमेंट की बनावटी सख्ती और भाषा की दीवारें—ये सब मिलकर कामकाजी लोगों की ज़िंदगी मुश्किल बना देते हैं।
यहां तक कि कुछ पाठकों ने सलाह दी—"ऐसे बेकार मैनेजमेंट के लिए क्यों काम करें? नई नौकरी ढूंढो!" और कुछ ने पूछा—"जिन दो घटनाओं पर नोटिस मिला, उनका सबूत कहां है?"
हमारे देश में भी अक्सर ऐसा ही होता है—आपने कुछ कह दिया, सामने वाला कुछ और समझ बैठा, और बॉस को मौका मिल गया फाइल में एक और नोट जोड़ने का!
चलिए, आप बताइए: आपके साथ भी हुआ है ऐसा?
क्या आपके साथ भी कभी किसी छोटी सी बात पर बड़ा बवाल खड़ा हो गया? क्या ऑफिस की राजनीति ने आपके अच्छे काम को भी निगेटिव बना दिया? कमेंट में जरूर बताइएगा—क्योंकि ऐसी कहानियां हर देश, हर दफ्तर में रोज़ ही बनती हैं।
अंत में, यही कहूंगा—भाषा, संस्कृति और समझदारी का तालमेल बैठाना जितना ज़रूरी है, उतना ही मुश्किल भी। तो अगली बार जब आप होटल जाएं, रिसेप्शनिस्ट से मुस्कुरा कर बात कीजिए—शायद उसकी मुस्कान के पीछे भी ऐसी ही कोई कहानी छुपी हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Written up for that?!?