विषय पर बढ़ें

आईटी की अनदेखी: उस दूरदराज़ द्वीप की अद्भुत कहानी

एक भुला हुआ द्वीप पर दूरस्थ क्लिनिक, अलग-थलग स्थानों में आईटी समर्थन की चुनौतियों को दर्शाता है।
एक भुला हुआ द्वीप पर दूरस्थ क्लिनिक का सिनेमाई दृश्य, जो अलग-थलग स्वास्थ्य सेवाओं में आईटी की कठिनाइयों की कड़वी वास्तविकता को उजागर करता है। यह छवि उस स्थान की आत्मा को पकड़ती है जहाँ कनेक्टिविटी एक दूर का सपना है।

क्या आपने कभी सोचा है कि आईटी सपोर्ट सिर्फ आपके दफ्तर तक सीमित नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे दूर-दराज़ और दुर्गम हिस्सों तक पहुंचने की जद्दोजहद करता है? लेकिन ज़रा सोचिए, अगर आईटी टीम ही आपको भूल जाए, तो? आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसी ही अनोखी कहानी—एक ऑस्ट्रेलियाई द्वीप की, जहाँ एक मेडिकल क्लिनिक था, खनन कंपनी के कर्मचारियों के लिए। आईटी समर्थन इतना मुश्किल था कि वहाँ टिकट देख सभी कर्मचारी सिर पर पैर रख भागने को तैयार रहते थे!

दूर द्वीप, आईटी सपोर्ट और 'जुगाड़' संस्कृति

ऑस्ट्रेलिया के इर्द-गिर्द कई छोटे-बड़े द्वीप हैं, जो मुख्य रूप से खनन के लिए इस्तेमाल होते हैं। जहाँ खनन, वहाँ सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत—यही सोचकर सिडनी में बैठी एक कंपनी ने वहाँ मेडिकल क्लिनिक खोल दिया। क्लिनिक तो खोल दिया, मगर आईटी सपोर्ट? वो सिर्फ फोन या इंटरनेट के सहारे, यानी "हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और" वाली बात!

क्लिनिक में लैपटॉप थे, जिनमें खास सिम कार्ड लगे थे, ताकि वे कंपनी के नेटवर्क से जुड़ सकें। लेकिन, मज़े की बात ये थी कि द्वीप पर सिग्नल ही नहीं आते थे! एक कमेंट में किसी ने बिल्कुल देसी अंदाज़ में कहा, "भैया, नेटवर्क ही नहीं, तो आईटी को भी चिट्ठी भेज दो—‘हम यहाँ फँस गए हैं!’"

'टिकट' का खेल और KPI की राजनीति

कहानी के हीरो—ऑरिजिनल पोस्टर—जब पहली बार इस द्वीप के क्लिनिक का टिकट उठाते हैं, तो ट्रेनिंग देने वाला साथी साफ़ कहता है, "भाई, इससे जितना दूर रह सको, रहो!" लेकिन जिज्ञासा ऐसी कि उन्होंने खुद हाथ डाल दिया। पता चला, प्रिंटर का मसला है, जो VDI (Virtual Desktop) से कनेक्ट नहीं हो पा रहा था। बाकी क्लिनिक में यही समस्या मिनटों में हल हो जाती, लेकिन यहाँ? सिग्नल गायब, ड्राइवर अपलोड नहीं हो पा रहा, और जब-जब नेटवर्क बदलो, कनेक्शन टूट जाता।

एक मज़ेदार कमेंट ने तंज़ कसा, "हमें तो लगा सपोर्ट का काम टिकट बंद करना है, न कि समस्या सुलझाना!" दरअसल, वहां KPI (Key Performance Indicator) पर इतना ज़ोर था कि मैनेजमेंट कहता, "आसान टिकट उठाओ, जल्दी बंद करो, नंबर बनाओ!" तो ऐसे मुश्किल मुद्दे पेंडिंग ही पड़े रहते।

'जुगाड़' और कंपनी की बंदरबांट

समस्याएँ यहीं नहीं रुकीं। कभी लैपटॉप में ड्राइवर न मिले, कभी वर्चुअल मशीन की डिस्क भर जाए, कभी यूज़र लॉगिन ही न कर पाए। हर हफ्ते कोई न कोई नया झमेला! और onsite IT स्टाफ? भैया, यहाँ तो कोई "शर्माजी का बेटा" भी नहीं, जो आकर झटपट फिक्स कर दे।

एक कमेंट ने बिल्कुल भारतीय टोन में लिखा, "कंपनी के अंदर ही इतने नियम-कायदे, कि जो सच में काम करता है, उसे ही डांट पड़ती है!" जैसे हमारे यहाँ सरकारी दफ्तरों में होती है—काम करो, तो फँसो!

क्लिनिक में हर हफ्ते नया कर्मचारी आता—FIFO (Fly-in Fly-out) सिस्टम। टिकट उठाते-उठाते हीरो का नाम वहाँ सबको याद हो गया। लेकिन जितनी बार समस्या हल करते, उतनी बार सिस्टम फिर बिगड़ जाता।

समाधान या 'चलता है' वाला रवैया?

क्लिनिक मैनेजर ने कई बार चिट्ठी लिखी—"कुछ पक्का समाधान तो निकालिए!" लेकिन कंपनी का जवाब—"जो है, सो है।" एक साल बाद जब खनन कंपनी ने कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल पर सवाल उठाया, तब जाकर आईटी टीम हरकत में आई। एक बंदे "टेड" को प्रोजेक्ट सौंपा गया—Windows 10 पर माइग्रेशन, नया डोमेन, हार्डवेयर अपग्रेड वगैरह। लेकिन असली नेटवर्किंग समस्या? उस पर भी जुगाड़—अब पुराने कर्मचारी को जिम्मेदारी दी कि जो नया आएगा, उसका लॉगिन सेटअप करवा दे।

एक पोस्टर ने बढ़िया लिखा, "क्या बॉस कभी खुद यूज़र से मिले हैं? ये तो नाकामी की दावत है!"

नतीजा? लॉगिन की समस्याएँ जस की तस, और धीरे-धीरे क्लिनिक का कॉन्ट्रैक्ट भी गया। क्लिनिक बंद, और आईटी टीम को पहले से पता चल जाता था—जैसे दफ्तर में अफवाह उड़ती है, "भैया, कंपनी बंद होने वाली है!"

पाठक के लिए चुटकी और सीख

कई पाठकों ने तो मज़ाक में कह दिया, "आईटी सपोर्ट? अरे भैया, यहाँ तो दारू या काउंसलिंग ही काम आएगी ऐसे टिकट्स के बाद!" एक अन्य ने अपने अनुभव शेयर किए, "हमने भी रिमोट सपोर्ट में यही झेला, आखिरकार सबका ध्यान बस टिकट बंद करने पर था, असल मदद पर नहीं।"

तो भैया, अगर आपके दफ्तर में भी आईटी की अनदेखी हो रही है, या 'जुगाड़' से ही काम चला रहे हैं, तो ये कहानी आपके लिए आईना है। सबसे बड़ी सीख: तकनीक चाहे जितनी भी एडवांस हो जाए, अगर ज़मीन पर सपोर्ट नहीं, तो सब बेकार!

निष्कर्ष: आपकी राय?

तो दोस्तों, आपको क्या लगता है—क्या भारत में भी ऐसे 'आईटी भुला हुआ द्वीप' जैसे हालात देखने को मिलते हैं? क्या आपके ऑफिस में भी ऐसे 'टिकट्स' हैं, जिनसे सब डरते हैं? अपने मज़ेदार अनुभव या सुझाव नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए—शायद कोई दूसरा भी आपकी बात पढ़कर मुस्कुरा उठे!


मूल रेडिट पोस्ट: The Island That IT Forgot About.