जब शरारती इंजीनियर की चालाकी पर भारी पड़ी सज्जनता – पेटी रिवेंज का देसी किस्सा
अगर आपको लगता है कि ऑफिस में सिर्फ काम-काज ही चलता है, तो जनाब! आप बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। दफ्तर, चाहे रेलवे का हो या कोई और, असली रंग वहीं नज़र आते हैं जहाँ सहकर्मियों की शरारतें, बदमाशियाँ और कभी-कभी ‘पेटी रिवेंज’ की कहानियाँ जन्म लेती हैं। आज मैं आपको एक ऐसी ही किस्सागोई सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें बेशर्मी, मासूमियत और बदले की भावना का तड़का है—और हां, इसमें कुछ ऐसा ट्विस्ट है कि पढ़कर आप भी कहेंगे, “वाह भाई, क्या चाल चली!”